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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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Page 38

प्रथम स्तबक ७
हिमालय की तटवर्ती भूमि में उन्होंने अपने सामने एक महान् ज्वालामय लिङ्ग को
देखा। उसे देखकर और उसका अन्त देखने के लिए उन दोनों में से एक ऊपर की ओर और दूसरा
नीचे की ओर चले ॥२८॥
जब वे दोनों ओर-छोर का पता न पा सके तब श्रान्त होकर तपस्या द्वारा उन्होंने
मुझे प्रसन्न किया और मैंने भी उनके सामने प्रकट होकर कहा कि वर मांगो ॥२९॥
ऐसा सुनकर ब्रह्मा ने कहा कि आप मेरे पुत्र हों इसी कारण (ऐसा ऊँचा वर माँगने
के कारण) निन्दित होकर ब्रह्मा अपूज्य हो गये ॥३०॥
तब विष्णु ने मुझसे वर माँगा कि 'हे भगवन् ! मैं सदा तुम्हारी सेवा में तत्पर
रह सकूँ' ऐसा वर दीजिए ॥३१॥
तभी से वे नारायण तुम्हारे रूप में उत्पन्न होकर मेरे अर्धाङ्ग बने। शक्तिमान्
मेरी शक्ति स्वयं नारायण हैं ॥३२॥
और तुम पूर्व जन्म की मेरी पत्नी हो शंकरजी के ऐसा कहने पर पार्वती ने पूछा—'मैं
पूर्व जन्म में तुम्हारी स्त्री कैसे हुई, यह बतलाओ' ॥३३॥
पार्वती के पूर्वजन्म की संक्षिप्त कथा
तब शिव ने उत्तर दिया— 'देवि प्राचीनकाल में दक्ष प्रजापति की तुम और अनेक
कन्याएँ उत्पन्न हुईं ॥३४॥
दक्ष ने तुम्हें मेरे लिए दिया और यम आदि अन्य देवताओं को दूसरी कन्याएँ प्रदान कीं।
एक बार उसने अपने यज्ञ में अपने सभी जामाताओं को निमन्त्रित किया ॥३५॥
जब उसने मुझे नहीं बुलाया तब तुमने उससे पूछा कि 'हे पिता ! तुमने मेरे पति को
क्यों नहीं बुलाया ? ॥३६॥
तब दक्ष ने कहा—'मुर्दों की माला पहननेवाले (अपवित्र) तुम्हारे पति को पवित्र
यज्ञ में कैसे बुलाया जाय'। उनके यह शब्द तुम्हारे कानों में जहरीली सुई के समान
चुभे ॥३७॥
पिता का उत्तर सुनकर 'इस पापी शरीर से क्या लाभ'—ऐसा सोचकर तुमने क्रोध
से उस शरीर का परित्याग कर दिया ॥३८॥
हे देवि तुम्हारे शरीर-त्याग करने पर मैंने क्रुद्ध होकर उस दक्षयज्ञ का नष्ट कर दिया
और उसके पश्चात् तुम हिमालय के घर में इस तरह उत्पन्न हुई जैसे क्षीर-समुद्र से
चन्द्रकला उत्पन्न हुई थी ॥३९॥
देवि स्मरण करो उसके अनन्तर मैं हिमालय पर्वत पर तप करने के लिए आया और
तुम्हें तुम्हारे पिता ने मुझ अतिथि की सेवा के लिए नियुक्त किया ॥४०॥
त्रिपुरासुर को मारने के लिए मेरे द्वारा पुत्र प्राप्त करने की इच्छा से देवताओं
द्वारा प्रेरित कामदेव उस अवसर पर मुझसे हता किया गया था ॥४१॥