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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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तृतीय लम्बक १३५
यह सब विद्याधरी की विद्या का प्रभाव समझकर और अंगूठी को देखता हुआ विदूषक
खेद और आश्चर्य के वशीभूत हो गया। उसकी बात को स्वप्न के समान स्मरण करता हुआ
विदूषक सोचने लगा कि वह उदय पर्वत का पता बताकर गई है। इसलिए उसे प्राप्त करने के
निमित्त मुझे भी वहीं शीघ्र जाना चाहिए ॥२४०-२४१॥
यदि मैं न जाऊँगा और लोग मुझे देखेंगे तो राजा मेरी इस स्थिति को देखकर
मुझे छोड़ देगा ॥२४२॥
इसलिए ऐसी युक्ति करता हूँ कि जिससे मेरा काम सिद्ध हो सके—ऐसा सोचकर
बुद्धिमान् विदूषक ने अपना रूप बदल लिया। फटे-पुराने कपड़े पहिने शरीर में धूल
लपेटे हुए वह देवीमन्दिर से बाहर निकलकर 'हा भद्रे ! हे भद्रे—इस प्रकार रटने
लगा ॥२४३-२४४॥
उस समय उसे इस स्थिति में देखकर उस देश के निवासी 'यह तो वही विदूषक
है'—ऐसा हुल्लड़ मचाने लगे। राजा आदित्यसेन ने यह समाचार जानकर उसे उस रूप में देख
कर पकड़वाकर अपने घर बुलवाया ॥२४५-२४६॥
वहाँ स्नेह-भरे भृत्यों एवं बन्धुओं के विविध प्रश्नों पर केवल 'हा भद्रे' 'हा भद्रे' ही कहता
रहा ॥२४७॥
वैद्यों द्वारा बताये गये उबटनों के लगाने पर भी वह पुनः बहुत-सी धूल उठाकर शरीर
में लपेट लेता था ॥२४८॥
राजकुमारी द्वारा प्रेमपूर्वक लाई गई भोजन की थाली को वह पैरों से मारकर फेंक
देता था ॥२४९॥
इस प्रकार पागलपन का प्रदर्शन करता हुआ अपने कपड़ों को फाड़ता हुआ वह विदूषक
लापरवाही से कुछ दिनों तक वहाँ रहा ॥२५०॥
'इसका रोग असाध्य है, इसे व्यर्थ कष्ट क्यों दिया जाय ? 'यदि कहीं इसने प्राण त्याग
दिये तो व्यर्थ की ब्रह्महत्या लगेगी, यह स्वच्छन्दचारी अपने समय से ही आरोग्य होगा'—राजा
आदित्यसेन ने ऐसा सोचकर उसे छोड़ दिया ॥२५१ २५२॥
वह स्वच्छन्दचारी पागल विदूषक उँगली में अंगूठी पहने हुए धीरे-धीरे भद्रा की ओर
चला (उदय पर्वत) ॥२५३॥
पूर्व दिशा की ओर दिन-रात चलते-चलते उसे मार्ग में पौण्ड्रवर्धन नाम का नगर
मिला ॥२५४॥