कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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पुत्री के स्नेह से माता के व्याकुल हो जाने पर क्रमशः राजा भी उठा और बहुत व्याकुल
हो गया॥२२५॥
मालूम होता है कि 'वह (मेरा पति) श्मशान के बाहरवाले देवी-मन्दिर में गया
होगा'—राजकुमारी के ऐसा कहने पर राजा आदित्यसेन स्वयं मन्दिर की ओर गया॥२२६॥
वहाँ पर विद्याधरी की विद्या के प्रभाव से तिरोहित विदूषक को राजा ने नहीं देखा॥२२७॥
तब राजा के लौट जाने पर निराश हुई उस राजकन्या से किसी ज्ञानी ने आकर
कहा—'तुम किसी प्रकार के अनिष्ट की शंका न करो। वह तुम्हारा पति जीवित है और शीघ्र
ही दिव्य भोगों से युक्त तुम्हें मिलेगा'॥२२८-२२९॥
यह सुनकर हृदय में बैठी हुई पति के लौटने की आशा से राजकन्या ने किसी तरह अपने
जीवन की रक्षा की॥२३० ॥
इधर जब विदूषक भद्रा नाम की विद्याधरी के साथ दिव्य भोगों का आनन्द ले रहा
था इसी बीच भद्रा की योगेश्वरी नामक सखी वहाँ आई॥२३१॥
वह आकर भद्रा से एकान्त में बोली कि हे सखि ! तुमने मनुष्य के साथ सम्पर्क कर लिया
है। इसलिए विद्याधर तुमपर बहुत क्रुद्ध हैं और तुम्हारा अहित करना चाहते हैं इसलिए
तुम यहाँ से भाग जाओ॥२३२-२३३॥
पूर्व समुद्र के पार कार्कोटक नामक नगर है। उसे पार करके सीतोदा नाम की
पवित्र नदी है। उसे पार करके उषयनामक महान् पर्वत है जो सिद्धों का क्षेत्र है॥२३४॥
वह उदय पर्वत विद्याधरों से आक्रान्त नहीं किया जा सकता। वहाँ तुम जाओ और अपने
प्यारे इस पुरुष के लिए चिन्ता न करो॥२३५॥
यह सब इस मनुष्य को बता देना तब यह प्राणवान् वीर पुरुष तुम्हारे जाने के अनन्तर
वहाँ पहुँच जायगा॥२३६॥
उस सखी के द्वारा डराई गई उस भद्रा ने विदूषक के प्रति अत्यन्त अनुरक्त होने पर
भी उसकी बात मान ली॥२३७॥
भद्रा विदूषक को सारी घटना समझाकर और अपनी अंगूठी उसे देकर रात्रि के अन्त
में स्वयं अन्तर्धान हो गई॥२३८॥
विदूषक ने रात बीतने पर ने न अपने को, न भद्रा को और न मन्दिर को
देखा॥२३९॥