कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextतृतीय लम्बक १३१
उसके सो जाने पर रात में वह विदूषक तलवार लेकर स्वस्थतापूर्वक देवी-मन्दिर को
गया॥२१०॥
मन्दिर के बाहर पहुँचकर उसने आवाज दी—'हे ! मैं विदूषक आ गया। अन्दर से किसी
की आवाज आई कि 'अन्दर आओ' ॥२११॥
उसने अन्दर जाकर दिव्य स्थान देखा। उसके अन्दर दिव्य रूप और दिव्य वस्त्रधारिणी
सुन्दरी को देखा। वह अपनी कान्ति से अन्धकार को ऐसे दूर कर रही थी मानों शिव के कोप से
जले हुए कामदेव को जिलाने के लिए जलती हुई सजीवनी औषधि हो॥२१२-२१३॥
'यह क्या देख रहा हूँ'—इस प्रकार आश्चर्यचकित विदूषक का उस प्रसन्न सुन्दरी ने
बड़े ही मान-सम्मान के साथ स्वागत किया॥२१४॥
कुछ समय के अनन्तर आश्वस्त होकर बैठे हुए और उस सुन्दरी का परिचय प्राप्त करने
के लिए उत्सुक विदूषक को वह सुन्दरी स्वयं कहने लगी—'मैं महान् वंश में उत्पन्न भद्रा नाम
की विद्याधरी हूँ अभी अविवाहिता कन्या हूँ। स्वेच्छाचारिणी होने के कारण उस दिन मैं
यहाँ आई और तुम्हें देखा। तुम्हारे गुणों से आकृष्ट होकर मैंने ही अदृश्य रूप से तुम्हें पुनः
आने के लिए आकाशवाणी की थी। मेरी विद्या से प्रेरित राजकुमारी ने आज तुम्हें मार
दिखाई॥२१५-२१८॥
भद्रा से कहे गये विदूषक ने 'ठीक है'—ऐसा स्वीकार करके गन्धर्व-विधान से उसके साथ
विवाह कर लिया। और, वही रात-भर ठहरकर, पौरुष-समृद्धि के फलस्वरूप उस प्रिया के
साथ दिव्य आनन्द लेने लगा ॥२१९-२२१॥
इसी बीच रात के अन्त में उठी राजकुमारी पति को न देखकर सहसा दुःखी हो
गई॥२२२॥
उठकर व्याकुल और आँसुओं से डबडबाते आँखोंवाली कुमारी लड़खड़ाती पैरों से माता
के पास गई॥२२३॥
अपने द्वारा किये गये अपराध पर पश्चात्ताप करती हुई राजकुमारी ने माता से कहा
कि 'मेरा पति रात में कहीं चला गया ॥२२४॥