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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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तृतीय लम्बक ३३
मार्ग में ऊँचे-ऊँचे घोड़ों के खुरों के आघात से शत-विक्षत भूमि राजा के द्वारा उपभोग
की हुई नायिका-सी मालूम होती थी ॥७॥
इस प्रकार बन्दिगणों से स्तुति किया जाता हुआ उदयन कुछ दिनों के अनन्तर कौशाम्बी
पहुँच गया ॥८॥
जिस प्रकार पति के प्रवास से लौटने पर पत्नी प्रसन्नता का प्रदर्शन करती हुई, शोभित
हो रही थी उसी प्रकार स्वामी के लौटकर आने पर कौशाम्बी-नगरी शोभित हो रही थी। नगरी
नायिका खंडों में छाये हुए खास वस्त्रों से ढँकी हुई थी भवनों के झरोखे मानों उसके खिले हुए
नेत्र थे। गुप्त द्वारों पर रखे हुए पूर्ण कुम्भ नगरों के पीन स्तनों के समान दीखते थे। जन-समाज
के कोलाहल के बहाने मानों नगरी स्वामी के आगमन पर प्रसन्नता-सूचक शब्द बोल रही थी।
सुधा-धवल स्वच्छ भवन नगरी-नायिका के हास-स्वरूप मालूम होते थे ॥९॥
राजा के प्रवास से लौटने पर प्रसन्न कौशाम्बी नगरी ऐसी प्रसन्न थी जैसे पति के प्रवास
से लौटने पर पत्नी प्रसन्न होती है ॥१ ॥
दोनों पत्नियों से अनुगमन किया जाता हुआ वह राजा नगरवासिनी स्त्रियों के लिए
अत्यन्त उल्लास और प्रसन्नता का विषय रहा ॥११॥
सुन्दर भवनों से देखती हुई सहस्रों नारियों के मुखचन्द्रों से आकाश भर गया मानों
वासवदत्ता के मुखचन्द्र से पराजित चन्द्रों की सेना उसकी सेवा के लिए एकत्र हो रही थी ॥१२॥
मकानों के झरोखों (खिड़कियों) से अपलक देखती हुई नागरिक रमणियां राजा को
देखने के लिए स्वर्ग से उतरी हुई विमानस्थ अप्सराओ का भ्रम उत्पन्न करती थी॥ झरोखों के
आगे लगी हुई सपक्ष्म आँखोवाली कुछ स्त्रियां मानों कामदेव के पत्रयुक्त बाणों के बाण (कटाक्ष)
छोड़ रही थी ॥ किसी सुन्दरी की बड़ी आँखें राजा को देखकर प्रसन्नता से फैलकर न देखते हुए
कानों को मानों समाचार देने के लिए उसके पास दौड़कर चली गई थीं ॥१३ १५॥
दौड़कर आई हुई किसी सुन्दरी के हाँफने से उछलते हुए स्तन राज-दर्शन के लिए मानों
चोली से बाहर निकलना चाहते थे ॥१६॥
घबराहट से दौड़कर खिड़की पर आती हुई किसी सुन्दरी का मुक्ताहार मानो हर्ष के आँसुओं
की लड़ी-सा टूटकर बिखर गया¹ ॥ कुछ महिलाएँ, लावानक मे वासवदत्ता के जल जाने के समाचार
पर टीका-टिप्पणी करती हुई आपस में कहने लगीं कि यदि लावानक में आग ने इसे सचमुच जला
दिया होता तो सचमुच वह जगत् प्रकाशक अग्नि संसार का अन्धरे में डाल देती ॥१७-१९॥
१.आनन्दाश्रु शीतल और शोकाश्रु गरम होते हैं। देखिए कालिदास—आनन्दजः
शोकश्रुनुवाष्पस्तयोरशीतं शिशिरो बिभेद। गङ्गा-सरय्वोर्जलमुष्ण तप्तं हिमाद्रिनिष्यन्द इवा-
वतीर्ण.-रघुवंश १४-३।