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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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Page 310

तृतीय लम्बक २६१
यौगन्धरायण ने तुरन्त लग्न लिखवाकर मगधराज के पास अपना दूत भेजा कि 'हम
लोगों ने आपका प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। अतः आज के सातवें दिन वत्सराज विवाह के
लिए आपके यहाँ बरात लेकर आयेगा' ॥६२ ६३॥
महामन्त्री ने यह भी कहलाया कि 'यदि राजा का विवाह शीघ्र ही हो जाय तो वह
वासवदत्ता को भूल जायगा। मगधराज ने सन्देश सुनकर उसका अभिनन्दन किया और कन्या के
स्नेह अपने उदार हृदय वैभव एवं मर्यादा आदि के अनुरूप विवाह की तैयारी में लग
गया ॥६४-६६॥
पद्मावती मनचाहे अनुरूप पति के मिलने की आशा से प्रसन्न हुई और इस वृत्तान्त को
सुनकर वासवदत्ता का हृदय शोक से सन्तप्त हो गया ॥६७॥
वासवदत्ता को मलिन कर देनेवाला यह समाचार, उसके गुप्तनिवास और विकृत
परिस्थिति के लिए सहायक हुआ ॥६८॥
'इस प्रकार यौगन्धरायण ने शत्रु को मित्र बना लिया पति का प्रेम तो तुमपर उसी
प्रकार है' इत्यादि बातें समझाकर वसन्तक ने रानी को धैर्य बँधाया ॥६९॥
पद्मावती का विवाह
कुछ समय के अनन्तर विवाह का समय समीप आने पर वासवदत्ता ने अम्लान माला और
तिलक-रचना से पद्मावती को पुनः सजा दिया ॥७०॥
सात दिन व्यतीत होने पर वत्सराज उदयन अपने मन्त्रियों और सेनाओं के साथ विवाह
के लिए मगध की राजधानी में धूमधाम से जा पहुँचा ॥७१॥
वत्सराज उदयन के मन में यदि यह आशा न होती कि वासवदत्ता प्राप्त हो जायगी
तो वह इस विवाह-प्रपंच में मन से भी उत्साहित न होता ॥७२-७३॥
इधर राजा ने मगध की राजधानी में प्रवेश किया और उधर नागरिकों के हृदय में महान्
आनन्द ने प्रवेश किया ॥७४॥
नागरिक स्त्रियों ने विरह से दुर्बल शरीरवाले तथापि मन को मोहन करनेवाले राजा
को रति-हीन कामदेव के समान देखा। पुर प्रवेश के अनन्तर राजा राजमहल में जाकर
सौभाग्यवती स्त्रियों से भरे हुए विवाहगृह (कौतुकागार) में पहुँचा ॥७५-७६॥