कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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Read in contextसोमदेव ने अपने वर्णन के बीच-बीच में नीति-संबंधी अनेक सूक्तियाँ डाल दी हैं। जैसे—
अर्थो हि यौवनं पुंसां तदभावश्च वार्धकम्।
तेनास्यौजौ बलं रूपमुत्साहश्चापि हीयते॥ (६।१।११६)
भवन्तिके प्रभो भूत्वा नपूर्व्वं भ्रमरास्तदम्।
मज्जन्तं च सरो हंसा मुञ्चन्त्यपि विरोदितम्॥ (६।१।११८)
शुचिनो न बिभेत्योस्ति न सन्तुष्टस्य चाशुभम्।
धीरस्य च विपन्नास्ति माहात्म्यं व्यवतामिव॥ ६।१।१२१
इस प्रकार नीति-संबंधी सूक्तियों की छौंक वर्णन के स्वाद को बढ़ा देती है और इस
युक्ति से सोमदेव ने पूरा लाभ उठाया है।
एक बार नरवाहनदत्त समुद्र के बीच में स्थित नारिकेलद्वीप से श्वेतद्वीप में आता है।
यह श्वेतद्वीप क्षीरोद समुद्र के पास था जिसे आजकल कास्पियन सागर कहते हैं। इस श्वेतद्वीप
का उल्लेख महाभारत के नारायणीय पर्व में हर्षचरित में तथा अन्य पुराणों में बहुधा आता है।
सोमदेव ने यह संकेत वहीं से अपनाया। श्वेतद्वीप में निवास करनेवाले नारायण की जो स्तुति
सोमदेव ने दी है वह स्तोत्र-विषय में भी उनकी सफलता की सूचक है (५।४२।९-१८)। स्तोत्र
साहित्य का यह चमकता हुआ नग है।
साहित्य की कितनी ही शैलियों और अभिप्रायों के बरतन में बढ़ी हुई निपुणता सोमदेव
का गुण था। कथासरित्सागर अनेकविध कहानियों का महार्णव है। उसके पूरे स्वरूप की कल्पना
कठिनाई से ही की जा सकती है। इस ग्रंथ का पठन और प्रचार अधिक होना चाहिए। भारतीयों
का विश्वास था कि कहानी सुनने से पाप नष्ट होता है। इसका अभिप्राय यही है कि अच्छी कहानी
मन के तनाव को दूर करती है और मनुष्य को फिर अपनी स्वाभाविक स्थिति में पहुँचा देती है।
यह नमक की उस चुटकी के समान है जो क्षार भोजन को स्वादिष्ट बनाती है। ऐसे ही जीवन के
अनेक व्यवहारों को करते हुए कहानी की उचित मात्रा से हम जीवन को अधिक रसपूर्ण बना सकते
हैं। सोमदेव का ग्रंथ बहुमूल्य कोशों का समूह है अर्थात् उसमें रत्नों से परिपूर्ण अनेक डिब्बे भरे
हुए हैं। चाहे वहाँ से अपनी रुचि के अनुसार हम उन्हें चुन सकते हैं।
बिहार राष्ट्रभाषा-परिषद् का यह प्रयत्न अभिनन्दन के योग्य है। इसमें कथासरित्सागर
का न केवल हिन्दी-अनुवाद बल्कि मूल संस्कृत-पाठ भी दिया गया है। इस अनुवाद का श्रेय
पं केदारनाथजी सारस्वत को है। पहले भाग में दस लम्बकों का अनुवाद उनका किया हुआ है।
अब वे नहीं रहे पर आशा है कि परिषद् इसी प्रकार से शेष लम्बकों को भी मूल और अनुवाद
के साथ प्रकाशित करेगी।
काशी-विश्वविद्यालय
शनिवार, ज्येष्ठ कृष्ण ४ सं २०१७
१४-५ १९६०
वासुदेवशरण अग्रवाल