कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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इस प्रकार विकृत वेषधारी वसन्तक के मुंह से कथा सुनकर बन्दी उदयन को अत्यन्त
सन्तोष हुआ और वासवदत्ता भी हृदय से प्रसन्न हुई ॥१९५॥
महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के कथामुखलम्बक का
चतुर्थ तरंग समाप्त
पञ्चम तरंग
उदयन की कथा वासवदत्ता-हरण
कुछ समय के अनन्तर पिता के पक्षपात से रहित होकर वासवदत्ता को वत्सराज उदयन
के प्रति प्रगाढ़ प्रेम हो गया ॥१॥
यह जानकर मन्त्री यौगन्धरायण अदृश्य रूप से पुन राजा उदयन के समीप आया।
उसकी अदृश्यकारिणी विद्या के प्रभाव से उसे दूसरे व्यक्ति न देख सके ॥२॥
उसने वसन्तक के सामने ही राजा से कहा—'महाराज तुम्हें चंडमहासेन ने
छल-कपट करके कैद कर लिया है और अपनी कन्या देकर तुम्हारा सम्मान करके तुम्हें
छोड़ देगा ॥३॥
इसलिए हम लोग स्वयं उसकी कन्या का अपहरण करके ले चलते हैं। इस प्रकार
इस अभिमानी का मान भंग होगा और संसार में तुम्हारी दुर्बलता का अपवाद भी न
होगा ॥४-५॥
राजा चंडसेन ने कन्या वासवदत्ता को भद्रवती नाम की हस्तिनी दी है। वह इतनी शीघ्रता
से चलती है कि दूसरे हाथी केवल एक नलगिरि को छोड़कर, उसका पीछा नहीं कर सकते।
नलगिरि भी उसे देखकर युद्ध नहीं करता। उस भद्रवती हस्तिनी के पीलवान (महावत) का
नाम आषाढ़क है। उसे मैंने पर्याप्त धन देकर अपने पक्ष में कर लिया है॥६-८॥
इसलिए उसी हस्तिनी की सवारी से वासवदत्ता को साथ लेकर तुम्हें रात के समय यहाँ
से छिपकर भागना चाहिए॥९॥
यहाँ के बड़े हाथीवान को मद्य पिलाकर ऐसा बेसुध कर देना चाहिए कि जिससे उसे होश
ही न रहे। अन्यथा वह हाथियों के संकेत समझने में अति निपुण है॥१० ॥
मार्ग रक्षा के लिए मैं तुम्हारे मित्र पुलिन्दक के पास अभी जाता हूँ। ऐसा कहकर
यौगन्धरायण चला गया ॥११॥
वत्सराज ने भी अपना सारा कर्त्तव्य सोच-समझ लिया। कुछ समय के पश्चात् वासवदत्ता
उसके समीप आई॥१२॥