कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
Page 23 of 876
Read in contextयहाँ पृष्ठ का लिप्यंतरण प्रस्तुत है:
परिचित कहानियों का सादृश्य उपस्थित करनेवाले रूपों में—हमारे लिए अत्यंत रुचिकर हैं।
क्षेमेन्द्र में कहीं अत्यधिक संक्षेप और कहीं अस्पष्टता के कारण कहानियों का सारा आकर्षण और
रोचकता ही नष्ट हो जाती है। ठीक इसके विपरीत पंचतंत्र के लेखक की तरह सोमदेव प्रतिभा के
धनी हैं। वे पाठक के मन को थकाए बिना सावधानी से अभीष्ट अर्थ का प्रकथन कर सकते हैं।
उनकी कहानियों का रुचिकर रूप कभी नहीं छीजता। (कीथ वही पृष्ठ ३३५)
कथासरित्सागर में कहानियों का एक बढ़िया गुच्छा बेतालपंचविंशति नामक पच्चीस
कहानियों का है (कथासरित्सागर, तरंग ७५-९९)। क्षेमेन्द्र की बृहत्कथामंजरी में भी ये
कहानियां हैं (९।२।११९-१२२१)। सोमदेव की अपेक्षा क्षेमेन्द्र का वर्णन संक्षिप्त और अलंकार-
रहित है। क्षेमेन्द्र में जहाँ केवल १२१९ श्लोक हैं वहीं सोमदेव में २१९५।$^१$ प्रश्न होता है कि
बेताल-विक्रम की ये कहानियां मूल बृहत्कथा में थीं या नहीं। इस विषय में हर्टेल और एजर्टन का
मत है जो सम्भाव्य है कि मूल बृहत्कथा में बेतालपंचविंशति की कहानियां विद्यमान न थीं।
नरवाहनदत्त के उपाख्यान से स्पष्टतः उनका कोई वास्तविक संबंध नहीं जान पड़ता। कीथ के
अनुसार बेतालपंचविंशति के उपाख्यानों पर बौद्ध प्रभाव स्पष्ट है।
पंचतंत्र की भी बहुत-सी कहानियां कथासरित्सागर में बिखरी हुई हैं। क्षेमेन्द्र ने उनको
पंचतंत्र के अनुसार एक साथ ही कर दिया है। इनमें से कम-से-कम आधी कहानियां चार सौ
पचास ईस्वी से पूर्व बने हुए एक ऐसे संग्रह में विद्यमान थीं जिसका उपयोग आर्यसेन संघ नाम के
एक भिक्षु ने अपने ग्रंथ में किया था और जिसका चीनी भाषान्तर उसके शिष्य गुणवृद्धि ने ४९२
ई. में किया था। सोमदेव ने भूतों की कहानियां कहने में बड़ा रस लिया है। इसके अतिरिक्त
चोर, जुआरी, धूर्त, वेश्यागामी, चालबाज़, हुँडोड़, कपटी, बदमाश, ठग, भण्डे, रंगीले भिक्षु
आदि की कहानियों की तह जमाने में सोमदेव को अद्भुत सफलता मिली है। उनकी दृष्टि में
समाज का अर्धांश चित्र नहीं, पूरा चित्र समाया हुआ है। भले और बुरे, ऊँच और नीच, धनी और
कंगाल, धर्मात्मा और गुण्डे सभी के उभरे हुए चित्र उनके ग्रंथ में पाए जाते हैं। जैसे समुद्र सब
नदियों का स्थान है, वैसे ही मानव-स्वभाव का जितना वैचित्र्य है, उसका पूरा अंकन सोमदेव ने अपने
ग्रंथ में किया है। सोमदेव ने स्त्रियों के स्वभाव के विश्लेषण में बहुत रुचि ली है। स्त्री-चरित्र की
अनन्त कहानियां उनके संग्रह में हैं। उनके स्वभाव के गुण-दोषों का चित्रण वे खुलकर करते हैं।
११वीं शती का काश्मीर स्त्रियों के विषय में कुछ अधिक सम्मानसूचक भाव से प्रभावित नहीं था।
पतिप्रेममयी हींगला और अमर्यादित उच्छृंखलता प्रायः स्त्री-चरित्र के ऐसे पक्ष को सामने
रखती हैं जो किसी प्रकार भव्य नहीं कहा जा सकता। सोमदेव का गुण इतना ही है कि वे कुछ
भी कहने में संकोच का अनुभव नहीं करते। जैसे बरसाती नदियों की मटमैली धाराओं के ऊपर
चारों ओर का चन्दनसार आकर बहने लगता है, वैसे ही सोमदेव की कथाओं की शैली बुराइयों
को समेटकर सामने ले आती है। मानव-स्वभाव जैसा है, वैसा ही उसे दिखाना यह महान् लेखक
पाद-टिप्पणी:
१. सुशील कुमार दे, संस्कृत-साहित्य का इतिहास, पृष्ठ ४२१ पाद टिप्पणी।