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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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द्वितीय लम्बक १८१
सेविकाओं की ऐसी बातें सुनकर और यौगन्धरायण को सामने देखकर राजा ने वासव-
दत्ता से कहा—कन्ये तुम जाकर सरस्वती-पूजा का सामान लाओ। फलतः गुरु की आज्ञा से
सहेलियों के साथ वासवदत्ता वहाँ से चली गई॥६१-६२॥
अब एकान्त देखकर छद्मवेषी यौगन्धरायण ने युक्तिपूर्वक राजा की बेड़ियाँ काट डालीं
और वासवदत्ता तथा उसकी सहेलियों को वश में करने के लिए राजा को वशीकरण की औषधियां
भी दे दीं॥६३-६४॥
और राजा से बोला—'हे महाराज ! वसन्तक भी छद्म-वेश धारण करके द्वार पर
खड़ा है। उसे अपने पास बुलवाओ॥६५॥
जब वासवदत्ता का तुम पर पूरा विश्वास हो जायगा तब मैं तुम्हे जो कहूँगा वह करना
अभी तुम मौन रहो' ॥६६॥
यौगन्धरायण राजा से इस प्रकार कहकर बाहर चला गया और उसी समय वासवदत्ता
सरस्वती-पूजन की सामग्री लेकर आई। उसके आने पर राजा ने वासवदत्ता से कहा कि एक
ब्राह्मण द्वार पर खड़ा है। उसे पूजा की दक्षिणा देने के लिए बुलवा लो। वासवदत्ता ने राजा
की आज्ञा से विकृत रूप धारण किये हुए उस ब्राह्मण को भीतर बुलवा लिया॥६७-६९॥
वसन्तक राजा उदयन के सामने आते ही रोने लगा उदयन भी भेद खुल जाने के भय से
उससे कहने लगा ॥७०॥
हे ब्राह्मण रोग के कारण तुममें जो यह कुरूपता आ गई है उसे मैं अभी दूर कर
देता हूँ। रोओ मत। मेरे पास रहो ॥७१॥
तब वसन्तक बोला—'देव ! यह आपकी महती कृपा है। राजा भी वसन्तक की विकृत
आकृति को देखकर मुस्कराने लगा ॥७२॥
वसन्तक राजा को प्रसन्नता से मुस्कराते हुए अपने रूप को और भी बिगाड़कर हँसने
लगा॥७३॥
पिशाच के समान उस वसन्तक को इस प्रकार विकृत रूप में हँसते हुए देखकर वासव-
दत्ता भी हँसने लगी और प्रसन्न हुई ॥७४॥
तब वासवदत्ता ने अपने हास्य-विकार के भय से उससे पूछा कि 'हे ब्राह्मण! तुम कौन-सा
विशेष ज्ञान रखते हो। बताओ तो सही ॥७५॥