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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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द्वितीय लम्बक १७१
इस प्रकार कहते हुए अंगारकासुर ने प्राण छोड़ दिये और राजा भी उसकी पुत्री अंगारवती
को लेकर उज्जैन चला गया ॥७३॥
उज्जैन में जाकर उस अंगारवती से विवाह करने पर चंडमहासेन राजा के दो पुत्र उत्पन्न
हुए, एक गोपालक और दूसरा पालक ! राजा ने दोनों का जन्मोत्सव खूब धूमधाम के साथ
मनाया ॥७४-७५॥
एक बार सोये हुए राजा को स्वप्न में इन्द्र ने कहा—'राजन् ! तुम मेरी कृपा से अपूर्व
सुन्दरी कन्या प्राप्त करोगे' ॥७६॥
इस प्रकार इन्द्र की कृपा से राजा को नवीन चन्द्रमा के समान सुन्दरी कन्या उत्पन्न हुई।
उसके उत्पन्न होते ही आकाशवाणी हुई कि इस कन्या के गर्भ से कामदेव का अवतार होगा जो सब
विद्याधरों का चक्रवर्ती होगा ॥७७-७८॥
राजा ने प्रसन्न होकर उस कन्या का नाम इसीलिए वासवदत्ता रखा कि उसे वह वासव
अर्थात् इन्द्र के प्रसाद से प्राप्त हुई थी ॥७९॥
वह कन्या इस समय राजा के भवन में उसी प्रकार निवास कर रही है जिस प्रकार
मन्थन से पहले समुद्र-गर्भ में लक्ष्मी निवास करती थी ॥८० ॥
यौगन्धरायण ने कहा—'महाराज ! वह उज्जैन का महाराजा चंडमहासेन इस प्रकार
सुदृढ़ दुर्ग में स्थित महाबलवान् है। वह सहज में ही नहीं जीता जा सकता। साथ ही राजन् ! वह
स्वयं ही तुम्हें कन्या देना चाहता है, किन्तु अत्यन्त आत्माभिमानी होने के कारण अपने पक्ष को
ऊँचा रखना भी चाहता है ॥८१-८२॥
इसलिए उस वासवदत्ता से तुम्हें अवश्य ही विवाह करना चाहिए। राजा उदयन मन्त्री
यौगन्धरायण की बातें सुनकर वासवदत्ता के प्रति अत्यन्त आकृष्ट होकर आत्मविस्मृत-सा हो
गया ॥८३॥
महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के कथामुखलम्बक का
तृतीय तरंग समाप्त
चतुर्थ तरंग
वत्सराज उदयन की कथा (क्रमशः)
इसी बीच कच्छराज के भेजे हुए दूत ने उसका प्रतिसन्देश चंडमहासेन के पास पहुँचा
दिया ॥१॥