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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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कवियों में उसकी प्रतिभा कालिदास से दूसरे स्थान पर आती है। स्पष्ट रोचक और मन को
खींच लेनेवाले ढंग से कहानी कहने की उसमें वैसी ही अद्भुत शक्ति थी जैसी कहानियों के विषयों
की व्यापकता और विविधता है। मानवी प्रकृति का परिचय भाषा-शैली की सरलता वर्णन
का सौन्दर्य और शक्ति एवं चातुर्य-भरी उक्तियां इन सब की रचना अत्यन्त प्रभावपूर्ण है।
दूसरी ओर जैसा कि प्रायः पूर्वी (विशेषतः भारतीय) कहानियों में मिलता है यहाँ
एक विशेषता यह भी है कि नई-नई कहानियां पहली कहानियों के पेटे में समाई हुई हैं और आश्चर्य
जनक वेग से एक के बाद दूसरी कहानी उभरती हुई सामने आती चली जाती है। तब पाठक
अभिलाषा करता है कि कोई सूत्र सहायक बनकर उसे कथाओं के इस भूल-भुलैये से उसका उद्धार
करे। इस संस्करण के सम्पादक ने इस प्रकार का एक सहायक सूत्र सावधानी के साथ तैयार
किया है और कहानियों पर संख्याओं के अंक डाल दिए गए हैं।
"कथासरित्सागर अलिफ लैला की कहानियों से प्राचीनतर ग्रंथ है और अलिफ लैला
की अनेक कहानियों के मूल रूप इसमें हैं। इसके द्वारा न केवल ईरानी और तुर्की लेखकों को
बल्कि बोकेशिओ चौसर एवं लां फौतिन एवं अन्य अनेक लेखकों के द्वारा पश्चिमी संसार को भी
अनेक कल्पनाएं प्राप्त हुई हैं। सोमदेव ने सोचा कि जैसे हिमालय से आई हुई अनेक धाराएं
आगे-पीछे बहती हुई समुद्र में ही पहुँच जाती हैं वैसे ही छोटी-बड़ी सभी कहानियां उनके इस महान्
ग्रंथ में इकट्ठी हो जायें और वह सच्चे अर्थ में कहानी-रूपी नदियों का सागर बन जाय।
कथासरित्सागर के रूप में कल्पना ने एक ऐसे महान् कथा-सागर की सृष्टि की है कि उसमें
अद्भुत कन्याओं और उनके साहसी प्रेमियों राजाओं और नगरों राजतन्त्र एवं षड्यन्त्र जादू
और टोने छल और कपट हत्या और युद्ध रक्तपायी बेताल पिशाच यक्ष और प्रेत पशु-पक्षियों
की सच्ची और गढ़ी हुई कहानियां एवं भिखमंगि साधु, विदग्धक जुआरी वेश्या विट और कुट्टनी
इन सभी की कहानियां एकत्र हो गई हैं। ऐसा यह कथासरित्सागर भारतीय कल्पना
जगत् का दर्पण है जिसे सोमदेव भविष्य की पीढ़ियों के लिए छोड़ गए हैं।"
कथासरित्सागर की वर्तमान संघटना और लम्बकों के क्रम की तात्विक आलोचना
करते हुए श्रीकीय ने जो लिखा है वह भी ध्यान देने योग्य है—
"कथासरित्सागर में मूल ग्रंथ के कथा-क्रम में परिवर्तन किया गया है और इस परिवर्तन
का अभिप्राय कथा के रस की रक्षा करना है। यह बात ग्रंथ के क्रम की वस्तु-स्थिति के बिलकुल
अनुकूल है। पहले पाँच लम्बकों में कोई परिवर्तन नहीं है। शेष लम्बकों में सोमदेव पर काव्य
के प्रभाव की रक्षा करने की अभिलाषा की प्रधानता थी। स्पष्टतया इसी कारण ने सोमदेव को
पंच और महाभिषेक नामक लम्बकों के मध्य की खाई को दूर करने के लिए विवश किया। उनके
ग्रंथ में उक्त दोनों लम्बकों का संक्रमण निर्दोष है। पंच नामक लम्बक का अन्त राजकुमार के
इस निर्णय से होता है कि उसे एक भावी सम्राट् के राज्याभिषेक के लिए आवश्यक रत्नों को प्राप्त
करना है। अगले लम्बक में यह प्रस्ताव आगे बढ़ता है। यह कुछ ऐसे आकस्मिक ढंग से होता है
जिसे सोमदेव बिलकुल मिटा नहीं सके हैं। परन्तु इससे सोमदेव रसमग्ना सर्वव्यापकी और