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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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राजपुत्री के गुप्त संकेत (इशारे) को न समझकर देवदत्त कर्तव्यमूढ़ होकर गुरुगृह
को आया ॥६५॥
घर आकर संकोचवश कुछ कहने में असमर्थ वह देवदत्त काम-संताप से अन्दर-ही-अन्दर
जलता एवं ठगा हुआ-सा मूक हो गया ॥६६॥
बुद्धिमान् आचार्य ने काम-विकारों से उसकी स्थिति को समझकर युक्ति से उससे पूछा
तो उसने जो कुछ हुआ था सब कह डाला ॥६७॥
वृत्तान्त सुनकर चतुर आचार्य ने कहा- 'दाँत से फूल फेंकते हुए उसने तुम्हें सूचित
किया है-॥६८॥
कि जो यह पुष्पों से शोभित पुष्पवन्त नाम का देव-मन्दिर है उसमें मेरी प्रतीक्षा करना।
इस समय जाओ ॥६९॥
गुरु से यह सुनकर और संकेत का अर्थ समझकर उस युवक ने घाम का परित्याग कर
दिया और उस मन्दिर के अन्दर जाकर उसकी प्रतीक्षा में बैठ गया ॥७०॥
वह राजकुमारी भी अष्टमी तिथि के कारण अकेली ही पुष्पवन्तेश्वर के दर्शन करने
को मन्दिर में आई और अन्दर गई ॥७१॥
मन्दिर में जाकर उसने द्वार के किवाड़ के पीछे उस प्रियतम को देखा। उसने भी उठकर उसे
सहसा गले लगा लिया ॥७२॥
राजपुत्री ने पूछा कि आश्चर्य है, तुमने संकेत को कैसे जान लिया। उसने कहा-'मैंने
नहीं मेरे गुरु ने जाना'। यह सुनकर राजकन्या क्रोध करके उससे बोली- 'मुझे छोड़ो तुम मूर्ख
(गँवार) हो'। ऐसा कहकर गुप्त बात के प्रकट हो जाने के भय से वह राजगृह को चली
गई ॥७३-७४॥
देवदत्त भी एकान्त में जाकर, प्राप्त होकर चली गई प्रियतमा का स्मरण करता हुआ
वियोग-अग्नि से विनष्टजीवन-सा हो गया ॥७५॥
पूर्व-तपस्या से प्रसन्न होकर शिवजी ने अपने भक्त को इस प्रकार पीड़ित देखकर उसकी
अभीष्ट-सिद्धि के लिए पंचशिख नामक गण को आज्ञा दी ॥७६॥
पंचशिख नामक गण ने उसे आश्वासन दिया। देवदत्त को स्त्री-वेष धारण कराया
और स्वयं बूढ़े ब्राह्मण का रूप धारण किया ॥७७॥
तब वह पंचशिख स्त्री-वेषधारी देवदत्त को साथ लेकर उस सुन्दरी के पिता राजा सुशर्मा
के पास जाकर बोला ॥७८॥
मेरा लड़का कहीं चला गया है मैं उसे खोजने के लिए जा रहा हूँ अतः तुम मेरी इस स्नुषा
(पतोहू) को धरोहर (अमानत) के रूप में रख लो ॥७९॥