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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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प्रथम लम्बक १०५
तब गोबिन्ददत्त ने शपथपूर्वक कहा कि मैं इन कुपुत्रों का कभी स्पर्श नहीं करता।
गोबिन्ददत्त की भार्या ने भी उसी प्रकार कहा। तब वैश्वानर ने किसी प्रकार उसका आतिथ्य ग्रहण
किया ।।४९-५० ।।
इस घटना को देखकर गोबिन्ददत्त का एक पुत्र देवदत्त अपनी इस स्थिति पर ग्लानि
के कारण पश्चात्ताप करने लगा ॥५१॥
माता-पिता के द्वारा इस प्रकार क्षेपित (तिरस्कृत) जीवन को देखकर और विरक्त
होकर देवदत्त तपस्या के लिए बदरिकाश्रम को चला गया ॥५२॥
वह देवदत्त बदरिकाश्रम में पहले पत्ते खाकर, फिर धूमपान करके शिवजी को प्रसन्न
करने की इच्छा से चिरकाल तक तपस्या करता रहा ॥५३॥
जब उसकी तीव्र तपस्या से सन्तुष्ट होकर शिवजी ने दर्शन दिये तब उसने उनसे उनका
ही अनुचर होने का वर माँगा ॥५४॥
'विद्याओं का अध्ययन करो और संसार के भोगों को भोगो तब तुम्हारी कामना सिद्ध
होगी'—शिवजी ने उसे ऐसी आज्ञा दी ॥५५॥
शिवजी का आदेश प्राप्त कर देवदत्त विद्याध्ययन के लिए पाटलिपुत्र नामक नगर में
आया और वेदकुंभ नामक अध्यापक की विधिपूर्वक सेवा करके पढ़ने लगा ॥५६॥
जब वह गुरु-गृह में विद्याध्ययन करता हुआ सेवा कर रहा था तब किसी समय कामातुरा
गुरु-पत्नी ने हठपूर्वक उसका वरण कर लिया। खेद है कि स्त्रियों की चित्तवृत्ति चंचल
होती है ॥५७॥
इस प्रकार काम-व्याकुल देवदत्त पाटलिपुत्र को छोड़कर सावधानी के साथ प्रतिष्ठान
नगर को चला गया ॥५८॥
वहाँ पर उसने बड़ी शाखीवाले एक वृद्ध गुरु से प्रार्थना करके विद्याओं का अध्ययन
किया ॥५९॥
प्रतिष्ठान में रहते हुए विद्वान् सुन्दर देवदत्त को एक बार नगर के राजा सुधर्मा की धी
नामक कन्या ने देखा जो स्वर्ग से अवतीर्ण दूसरी लक्ष्मी के समान थी ॥६० ॥
उसने भी खिड़की पर खड़ी उस कन्या को इस प्रकार देखा मानो विमान पर बैठकर विहार
करती हुई चन्द्रमा की अधिष्ठात्री देवी हो ॥६१॥
कामकीलित दृष्टि से परस्पर आबद्ध उन दोनों का वहाँ से हटना अशक्य हो गया ॥६२॥
तब राजकन्या ने कामदेव की मूर्तिमान् आज्ञा के समान एक अंगुली से 'यहाँ
समीप आओ' ऐसा संकेत किया ॥६३॥
उधर देवदत्त राजभवन की तरफ गया उधर वह रनिवास से बाहर आई और उसने
दाँतों-तले फूल दबाकर फिर उसकी ओर फेंका ॥६४॥
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