कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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दिन में सूर्य के तेज से पराभूत इन यक्ष राक्षसों और पिशाचों का प्रभाव क्षीण हो
जाता है। अतः ये रात में प्रभावशाली होकर हृषित होते हैं॥३५॥
जहां देवताओं और ब्राह्मणों का पूजन समुचित रूप से नहीं होता या जहां अनुचित और
भ्रष्ट रूप से भोजन किया जाता है, वहाँ ये प्रबल हो जाते हैं॥३६॥
जहाँ धर्मासम्भोगी या (पतिव्रता स्त्री) रहती है वहाँ ये नहीं जाते और पवित्र और
तथा प्रबुद्ध व्यक्तियों को भी कभी नहीं छेड़ते ॥३७॥
ऐसा कहकर भूतिवर्मा उसी समय बोला—जाओ! तुम्हारे शापनाश का कारण
सुप्रतीक आ गया है। यह मालूम होते ही मैं यहाँ आया और तुम्हें देखा। अब मैं पुष्पदन्त
द्वारा कही हुई उस कथा को सुनाता हूँ ॥३८ ३९॥
किन्तु मुझे यह एक कौतूहल (जिज्ञासा) है कि वह पुष्पदन्त के नाम से और तुम माल्यवान्
के नाम से कैसे प्रसिद्ध हुए, अर्थात् नामकरण का कारण बताओ ॥४०॥
पुष्पदन्त की पूर्वकथा
काणभूति के प्रश्न को सुनकर सुप्रतीक ने उससे कहा—गंगा के तटपर बहुसुवर्ण नाम का
एक गाँव है॥४१॥
उस गाँव में गोविन्ददत्त नाम का विभिन्न शास्त्रों का जाननेवाला ब्राह्मण रहता था।
उसकी अग्निशिखा नाम की परम पतिव्रता पत्नी थी ॥४२॥
उस ब्राह्मण ने उस ब्राह्मणी से पाँच पुत्र उत्पन्न किये। वे सभी मूर्ख किन्तु सुन्दर
और अभिमानी थे ॥४३॥
कुछ समय के अनन्तर गोविन्ददत्त के घर पर दूसरी अग्नि के समान (क्रोधी) वैश्वानर
नाम का एक ब्राह्मण आया ॥४४॥
उस समय गोविन्ददत्त के कहीं बाहर रहने पर उस अतिथि ने घर में जाकर उसके पुत्रों
का अभिवादन किया ॥४५॥
इन ब्राह्मणकुमारों ने उस अतिथि के आगत-स्वागत में और अभिवादन के उत्तर
में केवल हूँक दिया। इस प्रकार के व्यवहार से क्रुद्ध होकर वह ब्राह्मण उनके घर से निकल
चला ॥४६॥
इसके अनन्तर ही आये हुए गोविन्ददत्त ने इस प्रकार जाते ब्राह्मण से पूछा और क्षमा-
प्रार्थना आदि द्वारा अनुनय-विनय किया ॥४७॥
'तुम्हारे पुत्र मूर्ख हैं अतएव पतित हैं और उनके सम्पर्क में रहने के कारण तुम भी
पतित हो। अतः तुम जैसे पतित के यहाँ मैं भोजन न करूँगा। उसके लिए मुझे प्रायश्चित्त करना
होगा'—ब्राह्मण ने उसे इस प्रकार कहा ॥४८॥