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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)

DevanagariHindipublished876 pages

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प्रथम लम्बक ९१
तुम इतने मूर्ख हो कि 'मा' शब्द और उदक' शब्द की सन्धि भी नहीं जानते और
न बातों का प्रसंग ही समझते हो। तुम कैसे मूर्ख हो?"॥११७॥
शब्दशास्त्र को जाननेवाली रानी से इस प्रकार धत्कारा गया राजा अन्यान्य रानियों
के मन-ही-मन हँसने पर लज्जा से थक हो गया॥११८॥
ऐसी स्थिति में राजा हृतप्रभ होकर जलक्रीड़ा को छोड़कर अपमानित और मलिन-मुख
होकर अपने भवन में चला गया॥११९॥
तब चिन्ताओं से चूर, भोजन आदि को छोड़कर राजा चित्र में खिंचा-सा पड़ गया। कुछ
भी बोलता नहीं था॥१२०॥
पांडित्य की शरण में जाऊँ या मृत्यु की? ऐसा सोचता हुआ शय्या पर पड़ा हुआ राजा
अत्यन्त सन्तप्त होने लगा॥१२१॥
राजा की अकस्मात् ऐसी अवस्था देखकर यह क्या हुआ ? —ऐसा सोचते हुए सभी
सेवक-जन व्याकुल हो गये॥१२२॥
तब मैंने तथा शर्ववर्मा ने क्रमशः परिस्थिति को जाना। इतने में ही दिन समाप्त
हो गया॥१२३॥
'अब रात के समय अस्वस्थ राजा के पास जाना उचित नहीं —ऐसा विचारकर हम लोगों
ने राजहंस नामक राजा के निजी सेवक को बुलवाया॥१२४॥
उससे राजा की शारीरिक अवस्था पूछने पर उसने कहा कि 'महाराज को इतना अस्वस्थ
कभी नहीं देखा। अन्यान्य रानियों ने कहा कि 'झूठी पंडिता बनी हुई विष्णुशक्ति राजा की
पुत्री ने महाराज को इतना अस्वस्थ कर दिया है' ॥१२५ १२६॥
राजा के निजी सेवक से यह सुनकर सर्ववर्मा के साथ मैंने यह सोचा॥१२७॥
यदि शारीरिक व्याधि होती तो वैद्यों का प्रवेश होता। यदि मानसिक व्याधि है, तो
उसका कोई कारण मालूम नहीं होता॥१२८॥
कंटकों (विरोधियों) के शुद्ध कर देने के कारण उस राजा का शत्रु कोई नहीं है और
प्रजा भी राजा के प्रति प्रेम रखती है। अतः राजा को कौन-सी मानसिक चिन्ता हो
गई॥१२९॥
अतः 'अकस्मात् स्वामी को कौन-सा खेद उत्पन्न हुआ'—ऐसा सोचने पर बुद्धिमान्
सर्ववर्मा बोला॥१३०॥
'मैं जानता हूँ। इस राजा को मूर्खता के कारण पश्चात्ताप हुआ है, उसी के शोक से
पीड़ित हैं। मैंने इसके इस आशय को पहले ही जान लिया है। 'मैं मूर्ख हूँ' यह समझकर राजा
सदा पांडित्य चाहता है॥१३१॥