कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (origin)
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मेरे घर पहुँचते ही वहाँ के सभी मनुष्य मेरे सामने आकर रोने लगे। इस प्रकार, व्याकुल
मुझे उपवर्ष (श्वशुर) ने कहा—॥१९॥
‘राजा के द्वारा तुम्हारे मारे जाने का समाचार सुनकर उपकोशा ने शरीर को अग्नि
में दग्ध कर दिया और तुम्हारी माता का हृदय शोक से फट गया’ ॥१ ॥
यह सुनकर अमितव शोक के आक्रमण से मूर्च्छित होकर मैं हवा से गिराये हुए वृक्ष के
समान भूमि पर गिर पड़ा ॥१ २॥
मूर्च्छित होने के अनन्तर ही पागलों की भाँति प्रलाप करने लगा। प्रियतम बन्धु के विनाश
से उत्पन्न शोक-अग्नि किसे उत्तप्त नहीं करती ॥१ २॥
‘इस अनन्त संसार में अनित्यता ही एकमात्र नित्य वस्तु है, इस बात (ईश्वरी माया) को
जानते हुए भी तुम साधारण मनुष्यों के समान क्यों मोहित हो रहे हो ? आचार्य वर्ष ने आकर ऐसे
वचनों से मुझे प्रतिबोधित किया तब किसी प्रकार मुझे धैर्य प्राप्त हुआ ॥१ ३-१ ४॥
वररुचि का वैराग्य और महाप्रस्थान
तदनन्तर विरक्तहृदय होकर और सांसारिक सभी बन्धनों को छोड़कर मैं शान्तिपूर्वक
तपोवन की शरण में गया ॥१ ५॥
कुछ दिनों के अनन्तर मेरे तपोवन में रहते ही उसमें एक ब्राह्मण अयोध्या से आया ॥१ ६॥
मैंने उस ब्राह्मण से योगनन्द की राज्य-स्थिति के सम्बन्ध में पूछा। उसने मुझे पहचान
कर शोक के साथ कहा ॥१ ७॥
सुनो मन्त्रिवर्य त्यागकर तुम्हारे चले जाने पर धीरे-धीरे शकटाल का चिरकाल के बाद
अवसर मिला ॥१ ८॥
शकटाल ने युक्ति द्वारा नन्द के वध का उपाय सोचते-सोचते पृथ्वी को खोदते हुए
चाणक्य नामक ब्राह्मण को मार्ग में देखा ॥१ ९॥
शकटाल के यह पूछने पर कि ‘तुम भूमि क्यों खोद रहे हो ?’ उस ब्राह्मण ने कहा कि
‘मैं कुशांकुरों का उन्मूलन कर रहा हूँ क्योंकि इसने मेरे पैरों में व्रण (घाव) कर दिया' ॥११० ॥
चाणक्य की कथा
शकटाल ने उस ब्राह्मण का नाम पूछकर कहा—'हे ब्राह्मण मैं तुम्हें राजा नन्द के घर में
त्रयोदशी तिथि को श्राद्ध का निमन्त्रण देता हूँ ॥१११॥
भोजन की दक्षिणा से तुम्हें एक लाख सोने की मुहरें प्राप्त होंगी एवं और भी ब्राह्मणों में
ऊँचे बैठकर भोजन करोगे। आओ मेरे घर पर' ॥११२-११३॥
१ विशाखदत्त के मुद्राराक्षस में इस वार्ता को प्रकारान्तर से लिया गया है, किन्तु
मुद्राराक्षस की कथा का आधार यही है। चाणक्य के विषय में विस्तृत और ऐतिहासिक
विवेचन परिशिष्ट में देखिए।