कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
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Read in context| ८६ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| दृश्यते तु संस्कृतया अग्र्यया अग्रमिवाग्र्या तया, एकाग्रतयोपेतयेत्येतत्, सूक्ष्मया सूक्ष्मवस्तुनिरूपणपरया; कै:? सूक्ष्मदर्शिभिः 'इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्थाः' इत्यादिप्रकारेण सूक्ष्मतापारम्पर्यदर्शनेन परं सूक्ष्मं द्रष्टुं शीलं येषां ते सूक्ष्मदर्शिनस्तैः सूक्ष्मदर्शिभिः पण्डितैरित्येतत् ॥ १२ ॥ | गया है कि 'वह प्रकाशित नहीं होता'। वह तो संस्कारयुक्त और तीक्ष्ण—जो किसी पैनी नोकके समान सूक्ष्म हो ऐसी एकाग्रतासे युक्त और सूक्ष्म वस्तुके निरीक्षणमें लगी हुई तीव्र बुद्धिसे ही दिखलायी देता है। किन्हें दिखलायी देता है? [इसपर कहते हैं—] सूक्ष्मदर्शियोंको। 'इन्द्रियोंसे उनके विषय सूक्ष्म हैं' इत्यादि प्रकारसे सूक्ष्मताकी परम्पराका विचार करनेसे जिनका पर—सूक्ष्म वस्तुको देखनेका स्वभाव पड़ गया है, वे सूक्ष्मदर्शी हैं; उन सूक्ष्मदर्शी पण्डितोंको [वह दिखलायी देता है]—यह इसका भावार्थ है ॥ १२ ॥ |
लयचिन्तन
| तत्प्रतिपत्त्युपायमाह— | अब उसकी प्राप्तिका उपाय बतलाते हैं— |
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यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञस्तद्यच्छेज्ज्ञान आत्मनि ।
ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेत्तद्यच्छेच्छान्त आत्मनि १३
विवेकी पुरुष वाक्-इन्द्रियका मनमें उपसंहार करे, उसका प्रकाश-स्वरूप बुद्धिमें लय करे, बुद्धिको महत्तत्त्वमें लीन करे और महत्तत्त्वको शान्त आत्मामें नियुक्त करे ॥ १३ ॥