कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
DevanagariSanskritpublished182 pages
Page 95 of 182
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वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८३
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| समाश्रितं वटकणिकायामिव वटवृक्षशक्तिः।<br><br>तस्मादव्यक्तात्परः सूक्ष्मतरः सर्वकारणकारणत्वात्प्रत्यगात्मत्वाच्च महांश्च। अत एव पुरुषः सर्वपूरणात्। ततोऽन्यस्य परस्य प्रसङ्गं निवारयन्नाह पुरुषान्न परं किंचिदिति। यस्मान्नास्ति पुरुषात् चिन्मात्रघनात् परं किंचिदपि वस्त्वन्तरं तस्मात्सूक्ष्मत्वमहत्त्वप्रत्यगात्मत्वानां सा काष्ठा निष्ठा पर्यवसानम्।<br><br>अत्र हीन्द्रियेभ्य आरभ्य सूक्ष्मत्वादिपरिसमाप्तिः। अत एव च गन्तॄणां सर्वगतिमतां संसारिणां परा प्रकृष्टा गतिः “यद्गत्वा न निवर्तन्ते” (गीता ८।२१; १५।६) इति स्मृतेः॥ ११ ॥ | समान परमात्मामें ओतप्रोतभावसे आश्रित है।<br><br>उस अव्यक्तकी अपेक्षा सम्पूर्ण कारणोंका कारण तथा प्रत्यगात्मरूप होनेसे पुरुष पर—सूक्ष्मतर एवं महान् है। इसीलिये वह सबमें पूरित रहनेके कारण ‘पुरुष’ कहा जाता है। उसके सिवा किसी दूसरे उत्कृष्टतरके प्रसङ्गका निवारण करते हुए कहते हैं कि पुरुषसे पर और कुछ नहीं है। क्योंकि चिद्घनमात्र पुरुषसे भिन्न और कोई वस्तु नहीं है इसलिये वही सूक्ष्मत्व, महत्त्व और प्रत्यगात्मत्वकी पराकाष्ठा—स्थिति अर्थात् पर्यवसान है।<br><br>इन्द्रियोंसे लेकर इस आत्मामें ही सूक्ष्मत्वादिकी परिसमाप्ति होती है। अतः यही गमन करनेवाले अर्थात् सम्पूर्ण गतियोंवाले संसारियोंकी पर—उत्कृष्ट गति है, जैसा कि “जिसको प्राप्त होकर फिर नहीं लौटते” इस स्मृतिसे सिद्ध होता है॥ ११ ॥ |
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| ननु गतिश्चेदागत्यापि भवितव्यम्। कथं यस्माद्भूयो न जायत इति ? | **शङ्का—**यदि [ पुरुषके प्रति ] गति है तो [ वहाँसे ] आगति (लौटना) भी होना चाहिये; फिर ‘जिसके पाससे फिर जन्म नहीं लेता’ ऐसा क्यों कहा जाता है ? |