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कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished182 pages

Page 87 of 182

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Page 87

वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ७१


वेदितव्ये इति वाक्यार्थः। एतयोरेव ह्युपन्यासः कृत ऋतं पिबन्ताविति ॥२॥परब्रह्म—ये दोनों ही ज्ञातव्य हैं—यह इस वाक्यका अर्थ है। 'ऋतं पिबन्तौ' इत्यादि मन्त्रसे इन्हीं दोनों [ब्रह्मों] का उल्लेख किया गया है ॥ २ ॥

तत्र य उपाधिकृतः संसारी विद्याविद्ययोरधिकृतो मोक्षगमनाय संसारगमनाय च तस्य तदुभयगमने साधनो रथः कल्प्यते—उनमें जो उपाधिपरिच्छिन्न संसारी तथा मोक्ष एवं संसारके प्रति गमन करनेके लिये विद्या और अविद्याका अधिकारी है उसके लिये उन दोनोंके प्रति जानेके साधनस्वरूप रथकी कल्पना की जाती है—

शरीरादिसे सम्बन्धित रथादि रूपक

आत्मानग्ँ रथिनं विद्धि शरीरग्ँरथमेव तु ।
बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ॥ ३ ॥

तू आत्माको रथी जान, शरीरको रथ समझ, बुद्धिको सारथी जान और मनको लगाम समझ ॥ ३ ॥

तत्र तमात्मानमृतपं संसारिणं रथिनं रथस्वामिनं विद्धि जानीहि। शरीरं रथमेव तु रथबद्धहयस्थानीयैरिन्द्रियैराकृष्यमाणत्वाच्छरीरस्य। बुद्धिं तु अध्यवसायलक्षणां सारथिं विद्धि बुद्धिनेतृ-उनमें उस आत्माको—कर्मफल भोगनेवाले संसारीको रथी—रथका स्वामी जान। और शरीरको तो रथ ही समझ, क्योंकि शरीर रथमें बँधे हुए अश्वरूप इन्द्रियगणसे खींचा जाता है। तथा निश्चय करना ही जिसका लक्षण है उस बुद्धिको सारथी जान, क्योंकि