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कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished182 pages

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Page 76

| ६४ | कठोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
अणोः सूक्ष्मादणीयाञ्छ्यामाकादेरणुतरः। महतो महत्परिमाणान्महीयान्महत्तरःपृथिव्यादेः। अणु महद्वा यदस्ति लोके वस्तु तत्तेनैवात्मना नित्येन आत्मवत्संभवति । तदात्मना विनिर्मुक्तमसत्संपद्यते । तस्माद् असावेवात्माणोरणीयान्महतो महीयान्सर्वनामरूपवस्तूपपाधिकत्वात्। स चात्मास्य जन्तोर्ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तस्य प्राणिजातस्य गुहायां हृदये निहित आत्मभूतः स्थित इत्यर्थः ।आत्मा अणुसे भी अणु अर्थात् श्यामाक आदि सूक्ष्म पदार्थोंसे भी सूक्ष्मतर तथा महान्‌से भी महान् यानी पृथिवी आदि महत्परिमाणवाले पदार्थोंसे भी महत्तर है । संसारमें अणु अथवा महत्परिमाणवाली जो कुछ वस्तु है वह उस नित्यस्वरूप आत्मासे ही आत्मवान् (स्वरूप-सत्तायुक्त) हो सकती है । आत्मासे परित्यक्त हो जानेपर वह सत्ताशून्य हो जाती है । अतः यह आत्मा ही अणु-से-अणु और महान्-से-महान् है, क्योंकि नाम-रूपवाली सभी वस्तुएँ इसकी उपाधि हैं। वह आत्मा ही ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त इस सम्पूर्ण प्राणिसमुदायकी गुहा—हृदयमें निहित है अर्थात् अन्तरात्म-रूपसे स्थित है ।
तमात्मानं दर्शनश्रवणमननविज्ञानलिङ्गमक्रतुरकामो दृष्टादृष्टवाह्यविषयोपरतबुद्धिरित्यर्थः—यदा चैवं तदा मन आदीनि करणानि धातवः शरीरस्य धारणात्प्रसीदन्तीत्येषां धातूनांदेखना, सुनना, मनन करना और जानना—ये जिसके लिङ्ग हैं उस आत्माको अक्रतु—निष्काम पुरुष अर्थात् जिसकी बुद्धि दृष्ट और अदृष्ट बाह्य विषयोंसे उपरत हो गयी है, क्योंकि जिस समय ऐसी स्थिति होती है उसी समय मन आदि इन्द्रियाँ, जो कि शरीरको धारण करनेके कारण धातु कहलाती हैं, प्रसन्न होती हैं—सो,