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कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished182 pages

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Page 74
६२कठोपनिषद्[ अध्याय १

| तु शाश्वतोऽत एव पुराणः पुरापि नव एवेति। यो ह्यवयवोपचयद्वारेणाभिनिर्वर्त्यते स इदानीं नवो यथा कुम्भादिः। तद्विपरीतस्त्वात्मा पुराणो वृद्धिविवर्जित इत्यर्थः।<br><br>यत एवमतो न हन्यते न हिंस्यते हन्यमाने शस्त्रादिभिः शरीरे। तत्स्थोऽप्याकाशवदेव ॥ १८ ॥ | करता है। यह तो शाश्वत है, इसलिये पुराण भी है यानी प्राचीन होकर भी नवीन ही है। क्योंकि जो पदार्थ अवयवोंके उपचय (मेल) से निष्पन्न किया जाता है वही 'इस समय नया है' ऐसा कहा जाता है; जैसे घड़ा। किन्तु आत्मा उससे विपरीत स्वभाववाला है; अर्थात् वह पुराण यानी वृद्धिरहित है।<br><br>क्योंकि ऐसा है; इसलिये शस्त्रादिद्वारा शरीरके मारे जानेपर भी वह नहीं मरता—उसकी हिंसा नहीं होती। अर्थात् शरीरमें रहकर भी वह आकाशके समान निर्लिप्त ही है ॥ १८ ॥ |


हन्ता चेन्मन्यते हन्तुँꣳहतश्चेन्मन्यते हतम् ।
उभौ तौ न विजानीतो नायँꣳहन्ति न हन्यते ॥ १९ ॥

यदि मारनेवाला आत्माको मारनेका विचार करता है और मारा जानेवाला उसे मारा हुआ समझता है तो वे दोनों ही उसे नहीं जानते, क्योंकि यह न तो मारता है और न मारा जाता है ॥ १९ ॥

एवं भूतम्प्यात्मानं शरीरमात्रात्मदृष्टिर्हन्ता चेद्यदि मन्यते चिन्तयति हन्तुं हनिष्याम्येनम्ऐसे प्रकारके आत्माको भी जो देहमात्रको ही आत्मा समझनेवाला किसीको मारनेवाला पुरुष यदि किसीको मारनेका विचार करता