कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
Page 62 of 182
Read in context| ५० | कठोपनिषद् | [ अध्याय १ |
|---|
| सम्पद्यत आत्मा। अतर्क्यमतर्क्यः स्वबुद्ध्याभ्यूहेन केवलेन तर्केण। तर्क्यमाणेऽणुपरिमाणे केनचित् स्थापित आत्मनि ततो ह्यणतरम् अन्योऽभ्यूहति ततोऽप्यन्योऽणुतममिति न हि कुतर्कस्य निष्ठा क्वचिद्विद्यते ॥ ८ ॥ | जाता है; अपनी बुद्धिसे निकाले हुए केवल तर्कद्वारा इसका ज्ञान नहीं हो सकता। यदि कोई पुरुष तर्क करके उस अणुपरिमाण आत्माको स्थापित भी करे तो दूसरा उससे भी अणु तथा तीसरा उससे भी अत्यन्त अणु स्थापित कर देगा, क्योंकि कुतर्ककी स्थिति कहीं भी नहीं है ॥ ८ ॥ |
<br>नैषा तर्केण मतिरापनेया
प्रोक्तान्येनैव सुज्ञानाय प्रेष्ठ।
यां त्वमापः सत्यधृतिर्बतासि
त्वादृङ्नो भूयान्नचिकेतः प्रष्टा ॥ ९ ॥
हे प्रियतम ! सम्यक् ज्ञानके लिये शुष्क तार्किकसे भिन्न शास्त्रज्ञ आचार्यद्वारा कही हुई यह बुद्धि, जिसे कि तू प्राप्त हुआ है, तर्कद्वारा प्राप्त होने योग्य नहीं है। अहा ! तू बड़ा ही सत्य धारणावाला है। हे नचिकेतः ! हमें तेरे समान प्रश्न करनेवाला प्राप्त हो ॥ ९ ॥
| अतोऽनन्यप्रोक्त आत्मनि उत्पन्ना येयमागमप्रतिपाद्यात्ममतिर्नैषा तर्केण स्वबुद्ध्यभ्यूहमात्रेणापनेया न प्रापणीयेत्यर्थः। नापनेतव्या वा न हातव्या | अतः अभेददर्शी आचार्यद्वारा उपदेश किये हुए आत्मामें उत्पन्न हुई जो यह शास्त्रप्रतिपाद्य आत्मविषयक मति है वह तर्कसे अर्थात् अपनी बुद्धिके ऊहापोहमात्रसे प्राप्त होने योग्य नहीं है। अथवा [यह समझो कि] यह आत्मबुद्धि तर्कशक्तिसे अपनेतव्य यानी छोड़ी |