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कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished182 pages

Page 45 of 182

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वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३३


मरणं मरणसंबद्धं प्रश्नं प्रेतेऽस्ति नास्तीति काकदन्तपरीक्षारूपं मानुप्राक्षीमैवं प्रष्टुमर्हसि ॥२५॥मरनेके पश्चात् जीव रहता है या नहीं—ऐसा कौएके दाँतोंकी परीक्षाके समान मरणसम्बन्धी प्रश्न मत पूछ, तुझे ऐसा प्रश्न करना उचित नहीं है ॥ २५ ॥

एवं प्रलोभ्यमानोऽपि नचिकेता महाह्रदवदक्षोभ्य आह—इस प्रकार प्रलोभित किये जानेपर भी नचिकेताने महान् सरोवरके समान अक्षुब्ध रहकर कहा—

नचिकेताकी निरीहता

श्वोभावा मर्त्यस्य यदन्तकैत-
त्सर्वेन्द्रियाणां जरयन्ति तेजः ।
अपि सर्वं जीवितमल्पमेव
तवैव वाहास्तव नृत्यगीते ॥ २६ ॥

हे यमराज ! ये भोग 'कल रहेंगे या नहीं'—इस प्रकारके हैं और सम्पूर्ण इन्द्रियोंके तेजको जीर्ण कर देते हैं। यह सारा जीवन भी बहुत थोड़ा ही है। आपके वाहन और नाच-गान आपके ही पास रहें [ हमें उनकी आवश्यकता नहीं है ] ॥ २६ ॥

श्वो भविष्यन्ति न भविष्यन्ति वेति संदिह्यमान एव येषां भावो भवनं त्वयोपन्यस्तानां भोगानां ते श्वोभावाः। किं च मर्त्यस्य मनुष्यस्यान्तक हे मृत्यो यदेतत्सर्वेन्द्रियाणां तेजस्तज्जरयन्ति अपक्षयन्त्यप्सरःप्रभृतयो भोगाःआपने जिन भोगोंका उल्लेख किया है वे तो श्वोभाव हैं—जिनका भाव अर्थात् अस्तित्व 'कल रहेंगे या नहीं' इस प्रकार सन्देहयुक्त हो उन्हें श्वोभाव कहते हैं। बल्कि हे अन्तक—हे मृत्यो ! ये अप्सरा आदि भोग तो मनुष्यका जो यह सम्पूर्ण इन्द्रियोंका तेज है उसे