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कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished182 pages

Page 28 of 182

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Page 28
१६कठोपनिषद्[ अध्याय १

| स्मृतिः स एवायं पुत्रो ममागत इत्येवं प्रत्यभिजानन्नित्यर्थः। एतत्प्रयोजनं त्रयाणां प्रथममाद्यं वरं वृणे प्रार्थये यत्पितुः परितोषणम् ॥१०॥ | ऐसा स्मरण करके कि यह मेरा वही पुत्र मेरे पास लौट आया है, सम्भाषण करें। यह अपने पिताकी प्रसन्नतारूप प्रयोजन ही मैं अपने तीन वरोंमेंसे पहला वर माँगता हूँ ॥१०॥ |


मृत्युर्उवाच—मृत्युने कहा—

यथा पुरस्ताद् भविता प्रतीत
औद्दालकिरारुणिर्मत्प्रसृष्टः ।
सुखग्ँ रात्रीः शयिता वीतमन्यु-
स्त्वां ददृशिवान्मृत्युमुखात्प्रमुक्तम् ॥११॥

मुझसे प्रेरित होकर अरुणपुत्र उद्दालक तुझे पूर्ववत् पहचान लेगा। और शेष रात्रियोंमें सुखपूर्वक सोवेगा, क्योंकि तुझे मृत्युके मुखसे छूटकर आया हुआ देखेगा ॥११॥

यथा बुद्धिस्त्वयि पुरस्तात् पूर्वमासीत्स्नेहसमन्विता पितुस्तव भविता प्रीतिसमन्वितस्तव पिता तथैव प्रतीतवान्सन्नौद्दालकिः उद्दालक एवौद्दालकिः। अरुणस्यापत्यमारुणिः,द्व्यामुष्यायणो वा। मत्प्रसृष्टो मयानुज्ञातःतेरे पिताकी बुद्धि जिस प्रकार पहले तेरे प्रति स्नेहयुक्ता थी उसी प्रकार वह औद्दालकि अब भी प्रीतियुक्त होकर तेरे प्रति विश्वस्त हो जायगा। यहाँ उद्दालकको ही 'औद्दालकि' कहा है तथा अरुणका पुत्र होनेसे वह आरुणि है। अथवा यह भी हो सकता है कि वह द्व्यामुष्यायण* हो। 'मत्प्रसृष्टः'

* जो एक ही पुत्र दो पिताओंद्वारा संकेत करके अपना उत्तराधिकारी निश्चित किया जाता है वह 'द्व्यामुष्यायण' कहलाता है। वह अकेला ही दोनों पिताओंकी सम्पत्तिका स्वामी और उन्हें पिण्डदान करनेका अधिकारी होता है। जैसे पुत्ररूपसे स्वीकार किया हुआ पुत्रीका पुत्र अथवा अन्य दत्तक पुत्र आदि। अतः अकेले वाजश्रवसको ही औद्दालकि और आरुणि कहनेसे यह सम्भव है कि वह उद्दालक और अरुण दो पिताओंका उत्तराधिकारी हो।