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कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished182 pages

Page 25 of 182

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Page 25

वल्ली १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३


| उदकं नचिकेतेसे पाद्यार्थम्। यतश्चाकरणे प्रत्यवायः श्रूयते ॥ ७ ॥ | नचिकेताको पाद्य देनेके लिये जल ले जाइये। क्योंकि ऐसा न करनेमें प्रत्यवाय सुना जाता है ॥ ७ ॥ |


आशाप्रतीक्षे संगतꣳसूनृतां च

इष्टापूर्ते पुत्रपशूꣳश्च सर्वान् ।

एतद्वृङ्क्ते पुरुषस्याल्पमेधसो

यस्यानश्नन्वसति ब्राह्मणो गृहे ॥ ८ ॥

जिसके घरमें ब्राह्मण-अतिथि बिना भोजन किये रहता है उस मन्दबुद्धि पुरुषकी ज्ञात और अज्ञात वस्तुओंकी प्राप्तिकी इच्छाएँ, उनके संयोगसे प्राप्त होनेवाले फल, प्रिय वाणीसे होनेवाले फल, यागादि इष्ट एवं उद्यानादि पूर्त कर्मोंके फल तथा समस्त पुत्र और पशु आदिको वह नष्ट कर देता है ॥ ८ ॥

| [अतिथ्युपेक्षणे दोषाः]<br><br>आशाप्रतीक्षे अनिर्ज्ञातप्राप्येष्टार्थप्रार्थना आशा निर्ज्ञातप्राप्यार्थप्रतीक्षणं प्रतीक्षा ते आशाप्रतीक्षे, संगतं तत्संयोगजं फलम्, सूनृतां च सूनृता हि प्रिया वाक्तन्निमितं च, इष्टापूर्ते इष्टं यागजं पूर्तमारामादिक्रियाजं फलम्, पुत्रपशूंश्च पुत्रांश्च पशूंश्च सर्वानितत्सर्वं यथोक्तं वृङ्क्त आवर्जयति विनाशयतीत्येतत्—पुरुषस्याल्पमेधसोऽल्पप्रज्ञस्य—यस्यानश्नन्नभुञ्जानो ब्राह्मणो गृहे | जिसके घरमें ब्राह्मण बिना भोजन किये रहता है उस मन्दमति पुरुषके 'आशा-प्रतीक्षा'—आशा—जिनका कोई ज्ञान नहीं है उन प्राप्तव्य इष्ट पदार्थोंकी इच्छा तथा अपने प्राप्तव्य ज्ञात पदार्थोंकी प्रतीक्षा एवं संगत—उनके संयोगसे प्राप्त होनेवाले फल, सूनृता—प्रिय वाणी और उससे होनेवाले फल, 'इष्टापूर्त'—इष्ट—यागादिसे प्राप्त होनेवाले फल और पूर्त—बाग-बगीचोंके लगानेसे होनेवाले फल तथा पुत्र और पशु—इन उपर्युक्त सभीको नष्ट कर देता है। अतः तात्पर्य |