कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
Page 162 of 182
Read in context| १५० | कठोपनिषद् | [ अध्याय २ |
|---|
| तामीदृशीं तदवस्थां योगमिति मन्यन्ते वियोगमेव सन्तम्। सर्वानर्थसंयोगवियोगलक्षणा हीयमवस्था योगिनः। एतस्यां ह्यवस्थायामविद्याध्यारोपणवर्जितस्वरूपप्रतिष्ठ आत्मा। स्थिराम् इन्द्रियधारणां स्थिरामचलाम् इन्द्रियधारणां बाह्यान्तःकरणानां धारणमित्यर्थः। | उस ऐसी अवस्थाको ही—जो वास्तवमें वियोग ही है—योग मानते हैं, क्योंकि योगीकी यह अवस्था सब प्रकारके अनर्थसंयोगकी वियोगरूपा है। इस अवस्थामें ही आत्मा अपने अविद्यादि आरोपसे रहित स्वरूपमें स्थित रहता है। [उस अवस्थाको ही] स्थिर इन्द्रियधारणा कहते हैं—स्थिर अर्थात् अचल इन्द्रियधारणा यानी बाह्य और आन्तरिक करणोंको धारण करना। |
| अप्रमत्तः प्रमाद्वर्जितः समाधानं प्रति नित्यं यत्नवांस्तदा तस्मिन्काले यदैव प्रवृत्तयोगो भवतीति सामर्थ्यादवगम्यते। न हि बुद्ध्यादिचेष्टाभावे प्रमादसंभवोऽस्ति। तस्मात्प्रागेव बुद्ध्यादिचेष्टोपरमादप्रमादो विधीयते। अथवा यदैवेन्द्रियाणां स्थिरा धारणा तदानीमेव निरङ्कुशमप्रमत्तत्वमित्यतः | तत्र—उस समय साधक पुरुष अप्रमत्त—प्रमादरहित हो जाता है, अर्थात् चित्तसमाधानके प्रति सर्वदा सयत्न रहता है; जिस समय कि वह योगमें प्रवृत्त होता है [उस समय ऐसी स्थिति होती है]—ऐसा इस वाक्यकी सामर्थ्यसे जाना जाता है, क्योंकि बुद्धि आदिकी चेष्टाका अभाव हो जानेपर प्रमाद होना सम्भव नहीं है। अतः बुद्धि आदिकी चेष्टाका अभाव होनेसे पूर्व ही अप्रमादका विधान किया जाता है। अथवा जिस समय भी इन्द्रियोंकी धारणा स्थिर होती है उसी समय निरङ्कुश अप्रमत्तत्व होता |