कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
DevanagariSanskritpublished182 pages
Page 152 of 182
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१४० | कठोपनिषद् | [ अध्याय २
ईश्वरके ज्ञानसे अमरत्वप्राप्ति
यदिदं किं च जगत्सर्वं प्राण एजति निःसृतम् ।
महद्भयं वज्रमुद्यतं य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ २ ॥
यह जो कुछ सारा जगत् है प्राण—ब्रह्ममें, उदित होकर उसीसे, चेष्टा कर रहा है। वह ब्रह्म महान् भयरूप और उठे हुए वज्रके समान है। जो इसे जानते हैं वे अमर हो जाते हैं ॥ २ ॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-व्याख्या |
|---|---|
| यदिदं किं च यत्किं चेदं जगत्सर्वं प्राणे परस्मिन्ब्रह्मणि सत्येजति कम्पते तत एव निःसृतं निर्गतं सत्प्रचलति नियमेन चेष्टते। यदेवं जगदुत्पत्त्यादिकारणं ब्रह्म तन्महद्भयम्। महच्च तद्भयं च बिभेत्यस्मादिति महद्भयम्; वज्रमुद्यतमुद्यतमिव वज्रम्। यथा वज्रोद्यतकरं स्वामिनमभिमुखीभूतं दृष्ट्वा भृत्या नियमेन तच्छासने वर्तन्ते तथेदं चन्द्रादित्यग्रहनक्षत्रतारकादिलक्षणं जगत्सेश्वरं नियमेन क्षणमप्यविश्रान्तं वर्तत इत्युक्तं | यह जो कुछ है अर्थात् यह जो कुछ जगत् है वह सब प्राण यानी परब्रह्मके होनेपर ही उसीसे प्रादुर्भूत होकर एजन्—कम्पन—गमन अर्थात् नियमसे चेष्टा कर रहा है। इस प्रकार जो ब्रह्म जगत्की उत्पत्ति आदिका कारण है वह महान् भयरूप है। यह महान् भयरूप है अर्थात् इससे सब भय मानते हैं, इसलिये यह 'महद्भय' है। तथा उठाये हुए वज्रके समान है। कहना यह है कि जिस प्रकार अपने सामने स्वामीको हाथमें वज्र उठाये देखकर सेवकलोग नियमानुसार उसकी आज्ञामें प्रवृत्त होते रहते हैं उसी प्रकार चन्द्रमा, सूर्य, ग्रह, नक्षत्र और तारा आदिरूप यह सारा जगत् अपने अधिष्ठाताओंके सहित एक क्षणको भी विश्राम न लेकर नियमानुसार उसकी आज्ञामें बर्तता है। |