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कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

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DevanagariSanskritpublished182 pages

Page 150 of 182

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Page 150

१३८ कठोपनिषद् [ अध्याय २


प्रण्युपजीव्यानन्तफलस्तत्तृष्णास-युक्त, प्राणियोंकी आजीविकारूप
लिलावसेकप्ररूढजडीकृतदृढबद्ध-अनन्त फलोंवाला तथा फलोंकी
मूलः सत्यनामादिसप्तलोकब्रह्मा-तृष्णारूप जलके सिंचनसे बढ़े हुए और [सात्त्विक आदि भावोंसे] मिश्रित एवं दृढ़तापूर्वक स्थिर हुए [कर्म-वासनादिरूप अवान्तर] मूलोंवाला है; ब्रह्मा आदि पक्षियोंने जिसपर सत्यादि नामोंवाले सात लोकोंरूप घोंसले बना रखे हैं, जो प्राणियोंके सुख-दुःख-जनित हर्ष-शोकसे उत्पन्न हुए नृत्य, गान, वाद्य, क्रीडा, आस्फोटन, (खम ठोंकना) हँसी, आक्रन्दन, रोदन तथा हाय-हाय छोड़-छोड़ इत्यादि अनेक प्रकारके शब्दोंकी तुमुलध्वनिसे अत्यन्त गुञ्जायमान हो रहा है तथा वेदान्तविहित ब्रह्मात्मैक्यदर्शनरूप असङ्गशस्त्रसे जिसका उच्छेद होता है ऐसा यह संसाररूप वृक्ष अश्वत्थ है, अर्थात् अश्वत्थ वृक्षके समान कामना और कर्मरूप वायुसे प्रेरित हुआ नित्य चञ्चल स्वभाववाला है। स्वर्ग, नरक, तिर्यक् और प्रेतादि शाखाओंके कारण यह नीचेकी ओर फैली शाखाओंवाला है तथा सनातन यानी अनादि होनेके कारण चिरकालसे चला आ रहा है।
दिभूतपक्षिकृतनीडः प्राणिसुख-
दुःखोद्भूतहर्षशोकजातनृत्यगीत-
वादित्रक्ष्वेलितास्फोटितहसिता-
क्रुष्टरुदितहाहामुञ्चमुञ्चेत्याद्यनेक-
शब्दकृततुमुलीभूतमहारवो वेदा-
न्तविहितब्रह्मात्मदर्शनासङ्गशस्त्र-
कृतोच्छेद एष संसारवृक्षोऽ-
श्वत्थोऽश्वत्थवत्कामकर्मवातेरित-
नित्यप्रचलितस्वभावः, स्वर्ग-
नरकतिर्यक्प्रेतादिभिः शाखाभिः
अवाक्शाखः; सनातनोऽनादि-
त्वाच्चिरं प्रवृत्तः।
यदस्य संसारवृक्षस्य मूलं तदेव शुक्रं शुभ्रं शुद्धं ज्योतिष्मत्।इस संसारका जो मूल है वही शुक्र—शुभ्र—शुद्ध—ज्योतिर्मय अर्थात्