कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
DevanagariSanskritpublished182 pages
Page 146 of 182
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१३४ कठोपनिषद् [ अध्याय २
वहाँ (उस आत्मलोकमें) सूर्य प्रकाशित नहीं होता, चन्द्रमा और तारे भी नहीं चमकते और न यह विद्युत् ही चमचमाती है; फिर इस अग्निकी तो बात ही क्या है? उसके प्रकाशमान होते हुए ही सब कुछ प्रकाशित होता है और उसके प्रकाशसे ही यह सब कुछ भासता है ॥ १५ ॥
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| न तत्र तस्मिन्स्वात्मभूते ब्रह्मणि सर्वावभासकोऽपि सूर्यो भाति तद्ब्रह्म न प्रकाशयतीत्यर्थः। तथा न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमस्मद्दृष्टिगोचरः अग्निः। किंवहुना यदिदमादिकं सर्वं भाति तत्तमेव परमेश्वरं भान्तं दीप्यमानमनुभात्यनुदीप्यते। यथा जलोल्मुकाद्यग्निसंयोगादग्निं दहन्तमनु दहति न स्वतस्तद्वत्तस्यैव भासा दीप्त्या सर्वमिदं सूर्यादि विभाति। | वहाँ—उस अपने आत्मस्वरूप ब्रह्ममें सबको प्रकाशित करनेवाला होकर भी सूर्य प्रकाशित नहीं होता अर्थात् वह भी उस ब्रह्मको प्रकाशित नहीं करता। इसी प्रकार ये चन्द्रमा, तारे और विद्युत् भी प्रकाशित नहीं होते। फिर हमारी दृष्टिके विषयभूत इस अग्निका तो कहना ही क्या है? अधिक क्या कहा जाय? यह सूर्य आदि जो कुछ प्रकाशित हो रहे हैं वे सब उस परमात्माके प्रकाशित होते हुए ही अनुभासित हो रहे हैं, जिस प्रकार जल और उल्मुक (जलते हुए काष्ठ) आदि अग्निके संयोगसे अग्निके प्रज्वलित होते हुए ही दहन करते हैं उसी प्रकार उसके प्रकाश—तेजसे ही ये सूर्य आदि सब प्रकाशित हो रहे हैं। |
| यत एवं तदेव ब्रह्म भाति च विभाति च। कार्यगतेन | क्योंकि ऐसा है इसलिये वही ब्रह्म प्रकाशित होता है और विशेषरूपसे प्रकाशित होता है। कार्यगत |