कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
DevanagariSanskritpublished182 pages
Page 140 of 182
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| १२८ | कठोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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जिस प्रकार सम्पूर्ण लोकका नेत्र होकर भी सूर्य नेत्रसम्बन्धी बाह्यदोषोंसे लिप्त नहीं होता उसी प्रकार सम्पूर्ण भूतोंका एक ही अन्तरात्मा संसारके दुःखसे लिप्त नहीं होता, बल्कि उनसे बाहर रहता है ॥११॥
| सूर्यो यथा चक्षुष आलोकेन उपकारं कुर्वन्मूत्रपुरीषाद्यशुचिप्रकाशनेन तद्दर्शिनः सर्वलोकस्य चक्षुरपि सन् लिप्यते चाक्षुषैरशुच्यादिदर्शननिमित्तैराध्यात्मिकैः पापदोषैर्वाह्यैश्चाशुच्यादिसंसर्गदोषैः । एकः संस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः । | जिस प्रकार सूर्य अपने प्रकाशसे लोकका उपकार करता हुआ अर्थात् मल-मूत्र आदि अपवित्र वस्तुओंको प्रकाशित करनेके कारण उन्हें देखनेवाले समस्त लोकोंका नेत्ररूप होकर भी अपवित्र पदार्थादिके देखनेसे प्राप्त हुए आध्यात्मिक पापदोष तथा अपवित्र पदार्थोंके संसर्गसे होनेवाले बाह्यदोषोंसे लिप्त नहीं होता उसी प्रकार सम्पूर्ण भूतोंका एक ही अन्तरात्मा भी लोकके दुःखसे लिप्त नहीं होता, प्रत्युत उससे बाहर रहता है । |
| लोको ह्यविद्यया स्वात्मनि अध्यस्तया कामकर्मोद्भवं दुःखम् अनुभवति । न तु सा परमार्थतः स्वात्मनि । यथा रज्जुशुक्तिकोपरगगनेषु सर्परजतोदकमलानि न रज्ज्वादीनां स्वतो दोषरूपाणि | लोक अपने आत्मामें आरोपित अविद्याके कारण ही कामना और कर्मजनित दुःखका अनुभव करता है । किन्तु वह [अविद्या] परमार्थतः स्वात्मामें है नहीं, जिस प्रकार कि रज्जु, शुक्ति, मरुस्थल और आकाशमें [प्रतीत होनेवाले] सर्प, रजत, जल और मलिनता—ये उन रज्जु आदिमें स्वाभाविक दोषरूप नहीं हैं |