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कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

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DevanagariSanskritpublished182 pages

Page 138 of 182

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Page 138
१२६कठोपनिषद्[ अध्याय २

जिस प्रकार सम्पूर्ण भुवनमें प्रविष्ट हुआ एक ही अग्नि प्रत्येक रूप ( रूपवान् वस्तु ) के अनुरूप हो गया है उसी प्रकार सम्पूर्ण भूतोंका एक ही अन्तरात्मा उनके रूपके अनुरूप हो रहा है तथा उनसे बाहर भी है ॥ ९ ॥

| अग्निर्यथैक एव प्रकाशात्मा सन्भुवनं भवन्त्यस्मिन्भूतानीति भुवनमयं लोकस्तमिमं प्रविष्टः अनुप्रविष्टः रूपं रूपं प्रति दार्व्वादिदाह्यभेदं प्रतीत्यर्थः प्रतिरूपः तत्र तत्र प्रतिरूपवान्दाह्यभेदेन बहुविधो बभूव; एक एव तथा सर्वभूतान्तरात्मा सर्वेषां भूतानाम् अभ्यन्तर आत्मातिसूक्ष्मत्वाद् दार्व्वादिष्विव सर्वदेहं प्रति प्रविष्टत्वात्प्रतिरूपो बभूव बहिश्च स्वेनाविकृतेन स्वरूपेणाकाशवत् ॥ ९ ॥ | जिस प्रकार एक ही अग्नि प्रकाशस्वरूप होकर भी भुवनमें—इसमें सब जीव होते हैं इसीसे इस लोकको भुवन कहते हैं, उसी इस लोकमें अनुप्रविष्ट हुआ रूप-रूपके प्रति अर्थात् काष्ठ आदि भिन्न-भिन्न प्रत्येक दाह्य पदार्थके प्रति प्रतिरूप—उस-उस पदार्थके अनुरूप हुआ दाह्य-भेदसे अनेक प्रकारका हो गया है उसी प्रकार सम्पूर्ण भूतोंका एक ही अन्तरात्मा—आन्तरिक आत्मा अत्यन्त सूक्ष्म होनेके कारण काष्ठादिमें प्रविष्ट हुए अग्निके समान सम्पूर्ण शरीरोंमें प्रविष्ट रहनेके कारण उनके अनुरूप हो गया है तथा आकाशके समान अपने अविकारी रूपसे उसके बाहर भी है ॥ ९ ॥ |


तथान्यो दृष्टान्तः—ऐसा ही एक दूसरा दृष्टान्त भी है—