कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
by स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा
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कर्मयोग
वियोग हुआ होगा। क्या वे फिर लौट कर संसार में आवेंगे? और क्या यह जीवन-मरण का चक्र कभी बन्द होगा? कभी नहीं। अतएव अपने मस्तिष्क से इस संस्कार को निकाल डालो कि संसार तुम्हारी किसी बात की अपेक्षा रखता है, या तुम किसी की सहायता कर सकते हो। यह अभिमान है, स्वार्थ है, जो तुम को बन्धन में जकड़ता है। जब तुम किसी को कुछ दान करो तो उससे प्रत्युपकार की आशा न करो। उसकी कृतघ्नता तुम्हें कुछ हानि न पहुँचायेगी। तुम ने उसको जो कुछ दिया है, वह उसका अधिकारी था। उसके कर्म ने तुम्हें देने के लिए बाध्य किया। तुम्हारे कर्म ने तुमको भारवाही बना रक्खा था, फिर तुमको क्यों दान का अभिमान हो। तुम उसके कोषाध्यक्ष बने थे, वह अपना रुपया तुम से ले गया। सोचो, समझो, इसमें अभिमान की बात क्या है? जहाँ तुम बेलाग बने, फिर न कोई तुम्हारे लिए अच्छा है, न बुरा। केवल स्वार्थ से ही भलाई, बुराई पैदा होती है। इस रहस्य का समझना ज़रा कठिन है, पर समय आवेगा, जब तुम इसको समझोगे। तब संसार को तुम्हारे ऊपर कठोरता करने का अवसर हाथ न आवेगा। मनुष्य का आत्मा स्वतन्त्र है, वह स्वार्थ और काम के वश में हो कर ही अपने को परतन्त्र बना लेता है। निष्काम और निःस्वार्थ होना ही उस परतन्त्रता पर विजय पाना है। तुम स्वयं संसार के दास बन कर दूसरों की परतन्त्रता स्वीकार करते हो। जब संसार के मान, अपमान, हर्ष, शोक और प्रिय, अप्रिय तुम पर अपना प्रभाव न डाल सकेंगे, तब तुम स्वाधीन बनोगे।
व्यास एक बड़ा ऋषि था। वह वेदान्त सूत्रों का बनाने वाला