कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
by स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा
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Read in contextओ३म्
कर्मयोग
पहला अध्याय
कर्म का मनुष्य के चरित्र पर प्रभाव
कर्म एक संस्कृत भाषा का शब्द है जो "कृ" धातु से "मन्" प्रत्यय होकर बनता है । "क्रियते यत्तद् कर्म" जो किया जाय उसको कर्म कहते हैं। व्यवहार में कर्म के फल को भी 'कर्म' शब्द से व्यपदेश किया जाता है। कर्म का विस्तार और महत्त्व यहीं तक सीमाबद्ध नहीं है, किन्तु इसके विशाल वृत्त में कार्य और कारण रूप से वे सब कर्म और उनके विपाक समा जाते हैं जो हमारे भूत, वर्त्तमान और भविष्यत् तीनों कालों के जीवन से सम्बन्ध रखते हैं। परन्तु जहाँ तक कर्म-योग का सम्बन्ध है वहाँ तक हमारा तात्पर्य केवल वर्त्तमान जन्म के कर्मों तक सीमाबद्ध रहेगा ।
प्रत्येक मनुष्य के जीवन का उद्देश्य विवेक अर्थात् ज्ञान है । पूर्वीय दर्शन-साहित्य ने केवल ज्ञान को ही मनुष्य का अभीष्ट सिद्ध किया है। जो लोग सुख या आराम को मनुष्य-जीवन का उद्देश्य समझते हैं वे बड़ी भूल में हैं, क्योंकि सुख का अन्त होता है और उसके पश्चात् दुःख अवश्यम्भावी है । संसार में जितने दुःखमय दृश्य दिखाई दे रहे हैं इन सबका कारण केवल यही है