कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
by स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा
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Read in contextचौथा अध्याय ५३
उस दिन तो वह घर चला गया, दूसरे दिन फिर आया और साधु से गिड़गिड़ा कर भूत के लिए प्रार्थना करने लगा। साधु ने मुँह बना कर कहा—“अच्छा यह यन्त्र ले जा और यह मन्त्र पढ़ना। भूत तेरे पास आ जायगा और जो कुछ तू कहेगा सब कुछ कर देगा। पर सावधान रहना, यदि तू उसको काम न दे सकेगा तो वह तुझे मार डालेगा।” “मेरे पास काम बहुत है” यह कह कर और घर पर जा कर वह दरिद्र मन्त्र सिद्ध करने लगा। मन्त्र के पढ़ते ही एक भयङ्कर भूत, जिसके बड़े बड़े दाँत थे, प्रकट हुआ और कहने लगा—“मैं भूत हूँ, तूने मन्त्र के जाप से मुझे वश में कर लिया है। अब मुझे काम बता, नहीं तो मैं तुझे मार डालूँगा।” दरिद्र ने कहा—“मेरे लिए महल बना दे।” भूत ने कहा—“बन गया।” उसने कहा—“रुपया ला दे।” उत्तर मिला—“घर में कोष भरा हुआ है।” उसने कहा—“जङ्गल को काट कर साफ़ कर दे।” भूत बोला—“जङ्गल कट गया।” उसने कहा—“वहाँ एक नगर बसा दे।” भूत ने कहा—“नगर आबाद है, अब काम बताओ।” अब तो उस आदमी को घबराहट हुई और वह अपने मन में कहने लगा—यह विलक्षण आदमी है, जो काम कहो, पल भर में कर देता है, अब मैं क्या काम इसको दूँ। भूत ने कहा, झट पट काम बताओ, नहीं तो मैं तुमको खा जाऊँगा। भोले मनुष्य के पास कोई काम न रह गया था। वह डरके मारे भागा और उस महात्मा के पास पहुँच कर कहने लगा—महाराज ! बचाओ, यह भूत मुझे खाये डालता है। महात्मा ने पूछा—क्या बात है ? उसने कहा—मैं उसको काम नहीं दे सकता। जो कुछ कहता हूँ, मुझे कहते देर लगती है, पर उसे करते देर नहीं