कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
by स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा
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कर्मयोग
यज्ञ में लोटने से ऐसा नहीं हुआ, इसलिए मैं कहता हूँ कि तुम झूठे हो और यह यज्ञ नहीं है।
शोक कि उदारता और अतिथि-सेवा का यह आदर्श दिन प्रति दिन आर्यावर्त्त से लुप्त होता जा रहा है। जब मैंने पहले अँगरेज़ी पढ़ना आरम्भ किया, तब एक लड़के का वृत्तान्त पढ़ा जो बाहर काम करने के लिए गया हुआ था और विदेश से रुपया भेज कर माता की सहायता करता रहा। उसकी प्रशंसा में एक पुस्तक के चार पृष्ठ रँगे गये थे। मुझे आश्चर्य हुआ कि यह क्या बात है। हिन्दू-सन्तान की दृष्टि में तो यह कोई असाधारण बात नहीं। पर अब मैंने समझा कि क्यों इस लड़के की इतनी प्रशंसा की गई थी। यूरोप में यह शिक्षा दी जाती है कि प्रत्येक मनुष्य को अपनी चिन्ता आप करनी चाहिए। वहाँ प्रायः लोग केवल अपनी ही चिन्ता करते हैं और उनको इस बात की परवा तक नहीं होती कि माँ-बाप लड़के-बाले और घरवाली की क्या दशा होगी। यह अत्यन्त ही निन्दनीय प्रथा है। गृहस्थ के लिए यह आदर्श कभी न होना चाहिए।
अब तुम विचार करो कि कर्मयोग क्या वस्तु है? अन्तिम समय तक दूसरों का उपकार करना और प्रत्युपकार (बदले) का नाम तक मुँह पर न आने देना कर्मयोग है। दीनों को दान देकर कभी उनसे धन्यवाद या कृतज्ञता की आशा न करो। किन्तु तुम आप उनके कृतज्ञ बनो कि उनके कारण तुमको उदारता और दया के अभ्यास करने का अवसर हाथ आया। इसलिए गृहस्थाश्रम का धर्म संन्यासाश्रम के धर्म से कहीं कठिन है। कार्मिक जीवन त्याग के जीवन से कहीं दुराराध्य है।