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कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

by स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा

DevanagariHindipublished115 pages

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कर्मयोग

केवल कर्म के करने का हमको अधिकार है, उसके फल या विपाक को (यद्यपि वह अवश्य होगा) अपने इच्छानुसार बनाने का हमको अधिकार नहीं है। फल की इच्छा को त्याग दो। जब किसी मनुष्य की सहायता करने का अवसर आवे, कभी यह बात ध्यान में न लाओ कि उसका बर्ताव तुम्हारे साथ कैसा रहा है। यदि तुम कोई उत्तम या महान् कर्म करना चाहते हो तो इस कर्म का फल हमारे अनुकूल होगा या प्रतिकूल ? कभी भूल कर भी इसकी चिन्ता न करो।

धर्म के उक्त आदर्श तक पहुँचना एक बड़ा कठिन काम है। सबसे पहले अभ्यास की आवश्यकता है। हमको चाहिए, नित्य कर्म का अभ्यास करते रहें। कोई मनुष्य एक क्षण भर भी बिना कर्म के नहीं रह सकता। जिसको शान्ति और सुख कहा जाता है उसका समझना कोई सहज काम नहीं है। एक मनुष्य प्रवृत्ति-मार्ग के आन्दोलन में हाथ पाँव मारता हुआ जब कभी सामाजिक जीवन के गम्भीर आवर्त्त (भँवर) में पड़ता है, डूबने लगता है।

दूसरा मनुष्य जिसने निवृत्ति-मार्ग का आश्रय लेकर संसार को त्याग देने का प्रण कर लिया है, प्रत्येक वस्तु उसे तुच्छ और असार दीख पड़ती है। परन्तु इन दोनों में से कोई भी आदर्श का काम नहीं दे सकता। यदि कोई अयोग्य मनुष्य झूठे त्याग और वैराग्य की आड़ लेकर त्यागी तथा वैरागी बन जावे तो जब कभी संसारावर्त्त की लहरों के थप्पड़ उस पर पड़ने लगेंगे, तब वह इकबारगी कुचल दिया जायगा। जो मछलियाँ समुद्र के तल में रहती हैं, यदि कभी भूल से ऊपर चली आती हैं तो लहरों के तमाचे खाकर टुकड़े टुकड़े हो जाती हैं। उनका कहीं पता नहीं