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कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

by स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा

DevanagariHindipublished115 pages

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कर्मयोग

मय प्रभाव डाला हो। मनुष्य-जाति में यह एक अपूर्व उदाहरण है। ऐसी उच्च फ़िलासफ़ी और ऐसी प्रबल संवेदना और सहानुभूति आपको और कहाँ दीख पड़ती है? यह ऐसा उच्चमनस्क दार्शनिक हुआ है, जिसके गूढ़ विचार और उच्च सिद्धान्तों में काल्पनिक और विवादास्पद विषयों की मीमांसा या विवेचना मिलेगी। किन्तु मनुष्य की स्वभाव-सुलभ और अनुभव-सिद्ध जो बातें हैं, उन्हीं का विवेचन प्रबल युक्तियों के द्वारा इस महात्मा ने किया है। क्षुद्र से क्षुद्र प्राणी के साथ भी उसकी सहानुभूति थी। उसने सब के साथ दया-भाव प्रकट किया। जब तक जिया, दूसरों के कष्ट-मोचन और दुःख-निवारण में लगा रहा, पर अपने लिए किसी फल का इच्छुक नहीं हुआ। यही कर्मयोग का उच्च आदर्श है। इसमें न कोई स्वार्थ है और न निज का कोई उद्देश है। इतिहास पुकार पुकार कर कह रहा है कि बुद्ध जैसा निःस्वार्थ, त्यागी, सच्चा कर्मयोगी, महापुरुष संसार ने अब तक उत्पन्न नहीं किया। वह पहला मनुष्य था, जो कहा करता था कि "प्राचीन पुस्तकों की आज्ञाओं पर केवल उनके प्राचीन होने के कारण विश्वास न करो, अपने जातीय सिद्धान्तों पर केवल जातीयता के विचार से विश्वास न करो; किन्तु उनको बुद्धि की तुला पर तोल कर देखो, तर्क और युक्ति की कसौटी में परखो। यदि उनमें भलाई और सच्चाई है तो स्वीकार करो और उन पर विश्वास करो, और उन्हीं के अनुसार अपना जीवन बनाओ। अपने मन, वचन और कर्म को एक बनाओ और उनके द्वारा दूसरों की सहायता करो।" बस, यही गौतम-बुद्ध की शिक्षा है और यही कर्मयोग का सब से उच्च आदर्श है।