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कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

by स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा

DevanagariHindipublished115 pages

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सातवाँ अध्याय १०३

और यह तब हो सकता है जबकि भिन्न भिन्न शक्तियाँ उस उद्देश के लिए अपना काम करती हों ।

संसार एक प्रकार का चक्र है, जिसमें भिन्न भिन्न कर्मों के अरे ( डंडे ) लगे हुए हैं। यदि हम अपना हाथ उसमें दे देंगे तो फँस जायेंगे। हम सोचते हैं कि हमने एक काम कर लिया और अब हमको आराम मिलेगा। पर देखने में आता है कि अभी एक काम पूरा नहीं हुआ, दूसरा आकर हमारे सामने खड़ा हो जाता है और यह संसार-चक्र हमको बलात् खींच ले जाता है। इससे बचने के दो उपाय हैं। एक यह कि चक्र से अलग खड़े रह कर तमाशा देखो, इसमें अपना हाथ मत दो। पर यह काम बड़ा कठिन है। मैं नहीं कह सकता कि २० करोड़ में एक मनुष्य भी ऐसा निकल सके। कहना सहज है, पर करना बड़ा कठिन है। दूसरा उपाय यह है कि संसार-समुद्र में प्रवेश करो, कर्म के रहस्य को समझो। संसार-चक्र से अलग मत रहो, किन्तु इसके सुरक्षित स्थान में बैठ कर संसार की परिक्रमा करो। स्मरण रक्खो, इस चक्र के भीतर से ही बाहर निकलने का द्वार है। परन्तु उस द्वार से वे ही निकल सकते हैं, जो कर्मों के डंडों में अपना हाथ नहीं देते। यदि तुम भी निर्लेप रह कर कर्म करोगे तो एक दिन इस चक्र से अवश्य बाहर निकल आओगे।

अब हमने जान लिया कि कर्म क्या है। इसी कर्म के आधार पर संसार की नींव रक्खी गई है और यह अनादि काल से प्रवाह रूप में इस संसार को चला रहा है। जो लोग ईश्वर पर विश्वास रखते हैं, वे इस कर्म के रहस्य को औरों की अपेक्षा अधिक समझ