कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
by स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा
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की इच्छा है तो साथ ही साथ मरना भी होगा। एक मनुष्य, जो अवनति की ओर देखता है, दुःखी हो जाता है। दूसरा जो उन्नति की ओर देख रहा है, अपने को सुखी समझता है। एक बालक, जिसको कोई चिन्ता नहीं है और जिसके माता-पिता संरक्षक वर्त्तमान हैं, अपने लिए प्रत्येक वस्तु को सुखदायक मानता है और प्रसन्न रहता है। बूढ़ों का अनुभव इसके बिलकुल विरुद्ध है। उनकी सब आशायें मन्द और शान्त होगई हैं; उनको पद पद पर मृत्यु का भय लगा हुआ है, जो कभी उनको सुख की नींद नहीं सोने देता। पुरानी जातियों में उदासीनता छाई हुई है, उनकी सब आशायें मर चुकीं। नई जातियाँ उत्साह में भरी हुई हैं, क्योंकि उनके चढ़ाव और उभार के दिन हैं। आर्यावर्त्त में एक कहावत चली आती है "हज़ार वर्ष का नगर हज़ार वर्ष का जङ्गल।" नगर उजड़ कर जङ्गल और जङ्गल आबाद होकर नगर बनते रहते हैं। इसी प्रकार सुख-दुःख का चक्र भी संसार में चल रहा है।
इसके पश्चात् समता (बराबरी) का सिद्धान्त भी विचारणीय है। किन्हीं किन्हीं मतवालों का विश्वास है कि ईश्वर उनका न्याय करने के लिए आवेगा, तब बड़ाई-छुटाई का सारा भेद मिट जायगा। यह सिद्धान्त कट्टर मनुष्यों का है जो अपने विश्वास में सच्चे हैं, पर सच्चाई से कोसों दूर हैं। इसी विश्वास ने रूम व यूनान के ग़ुलामों को ईसाई-धर्म की ओर आकर्षित किया। यह ग़ुलाम समझने लगे—जब ऐसा समय आवेगा, उनको ख़ूब खाने-पीने को मिलेगा। और वे झुण्ड के झुण्ड मसीही-झंडे के तले आने