कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
by स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा
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चाहिए। प्रत्येक वस्तु, जिसको हम देखते हैं, स्वतन्त्रता के लिए छटपटा रही है। निर्जीव अणु से लेकर सजीव मनुष्य तक सब इसी स्वतन्त्रता के लिए उद्योग कर रहे हैं। प्रत्येक सघन वस्तु या पिण्ड—क्या समष्टिरूप से और क्या व्यष्टिरूप से—एक दूसरे से पृथक् होने का यत्न कर रहे हैं, पर उनका कर्म-चक्र ऐसा घूम रहा है कि वह उनको क्षण भर के लिए भी पृथक् होने नहीं देता। पृथिवी सूर्य से भागना चाहती है, चन्द्रमा पृथिवी से अलग रहना चाहता है। प्रत्येक वस्तु (चाहे वह जड़ हो या चेतन) जिन बन्धनों में बँधी हुई है, उनसे वह छूटना चाहती है और यही स्वतन्त्रता की स्वाभाविक इच्छा है। इसी के लिए योगी योग और भक्तजन भक्ति करते हैं और इसी की इच्छा से डाकू और लुटेरे लूट-मार में लगे हुए हैं। जब काम करने का ढंग अच्छा नहीं होता, हम उसको बुरा कहते हैं। मुमुक्षु को बन्धन का दुःख है, वह उससे छूटना चाहता है, इसलिए वह भक्ति और ज्ञान का आश्रय लेता है। चोर को किसी वस्तु की आवश्यकता है, वह दीनता के दुःख से बचना चाहता है, इसलिए चोरी करता है। दोनों का उद्देश्य एक ही मुक्ति है, सिर्फ़ इनके काम करने के ढंग भिन्न भिन्न हैं। एक उचित रीति पर अपना इष्ट-साधन करना चाहता है, दूसरा अनुचित रीति पर। जड़ हों या चेतन, मूर्ख हों या विद्वान् सब एक ही स्थान पर पहुँचना चाहते हैं।
सारे धर्म और सम्प्रदाय भी इसी मुक्ति के ग्राहक हैं, परन्तु यह मुक्ति बिना अपने आप को मिटाये किसी को मिल नहीं सकती। आप को मिटाने का यह आशय नहीं है कि हम आत्म-