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कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

by स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा

DevanagariHindipublished115 pages

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कर्मयोग

से सेब गिरा, न्यूटन के अन्तःकरण को एक संकेत मिल गया और वह अपने मन में विचार करने लगा। उसने अपने पूर्व संस्कारों की शृङ्खला में एक नवीन कड़ी देखी और उसी का नाम आकर्षण-शक्ति रख लिया। यह ज्ञान न तो सेब में था और न पृथ्वी में; किन्तु उसके हृदय में था। वस्तुतः प्रत्येक ज्ञान (चाहे वह बाह्य हो या आन्तरिक, सांसारिक हो या आध्यात्मिक) मनुष्य के अन्तःकरण में रहता है। किन्हीं मनुष्यों में वह ढका हुआ रहता है, उसका आवरण शीघ्र नहीं उतरता। जब शनैः शनैः यह आवरण उतरने लगते हैं, तभी यह कहा जाता है कि हम सीख रहे हैं। मनुष्य की ज्ञानोन्नति में उत्तरोत्तर यही रहस्य काम करता रहता है। जिस मनुष्य के आवरण टूट जाते हैं वही तत्त्वज्ञानी और विवेकी हो जाता है और जिसके बने रहते हैं, वह अज्ञानी और मूर्ख कहलाता है। जिसके समस्त आवरण टूट गये, वह सर्वज्ञ बन जाता है। संसार में ऐसे बहुत से सर्वज्ञ हुए हैं और इस कल्प में भी उत्पन्न होंगे।

जिस प्रकार पत्थर में आग रहती है उसी तरह अन्तःकरण में ज्ञान रहता है। जैसे बाहर की रगड़ पाकर पत्थर में से आग झड़ने लगती है, वैसे ही बाह्य कर्म के संघर्षण से ज्ञानाग्नि प्रदीप्त होता है, तथा शिक्षा और उपदेश के इन्धन से बढ़ता जाता है। हमारे सारे संस्कारों, कर्मों और वासनाओं में यही नियम काम कर रहा है। हमारा हर्ष और शोक, निन्दा या स्तुति, सुख या दुख, शुभ या अशुभ जो कुछ भी परिणाम होता है वह सब इसी नियम की सत्यता को प्रकट कर रहा है। यदि हम तनिक गम्भीर दृष्टि से