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कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariHindipublished259 pages

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द्वितीय अध्याय-२ [ ३१७
चंदन चर्चित कमल-पत्र क हिलाती हुई हवा कर रही थी ।५।
रेवावारिपरिस्नात परागास्य`समागतम् ।
धृतनीर रसगत निन्दन्ती पवनप्रियम् ॥६॥
शुकः सकरुण साधु-वचनैस्तामतोषयत् ।
सा, त्वमेह्य हि, तेस्वस्ति स्वागत? स्वस्ति मे शुभे! ।७।
गते त्वय्यतिव्यग्राह शान्तिस्तेऽस्तु रसायनात् ।
रसायन दुर्लभ मे, सुलभ ते शिवाश्रमे ।८।
क्व मे भाग्यविहीनाया इहैव वरवर्णिनि ।
देवि! तं सरमस्तीरे प्रतिष्ठाप्यागता वयम् ।६।
परागमय जलगर्भ से सरस हुआ प्रिय पवन उस समय पद्मा
के द्वारा निन्दा को प्राप्त हो रहा था ।६। तभी शुक ने करुणामय सुन्दर
वचन कह कर पद्मा को आश्वासन दिया । जिसे सुन कर पद्मा
बोली-तुम्हारा स्वागत है । यहाँ आओ, तुम्हारा मगल हो । शुक
बोला- हे शुभे ! मेरा सर्व प्रकार से मगल ही है ।७। पद्मा बोली-
हे शुक ! तुम्हारे जाने से मैं अत्यन्त व्यग्र रही हूँ । शुक ने कहा-
तुम्हारे सब दुख ताप रसायन के द्वारा शान्त हो जाँयगे ।
पद्मा ने कहा-मेरे लिए तो रसायन भी दुर्लभ है। शुक ने कहा- हे
शिवजी की शिष्ये ! रसायन तुम्हारे लिए सुलभ ही है।८। पद्मा
बोली- मुझ भाग्यहीना की कामना किस प्रकार और कहाँ पूर्ण होगी ?
शुक बोला-हे वरवर्णिनि ! तुम्हारी अभिलाषा यही पूर्ण होगी । मैं उन्हे
सरोवर के तट पर विराजमान करके तुम्हारे पास उपस्थित हुआ हूँ । ६।
एवमन्योन्यसम्वाद-मुदितात्ममनोरथे ।
मुख मुखेन नयन नयने साह्रता ददौ ।१०।
विमलामालिनी लोला कमला कामकन्दला ।
विलासिनी चारुमती कुमुदेत्यष्ट नायिकाः ।११।
सख्य एता मतास्ताभिर्जलक्रीडार्थमुद्यताः ।
पद्मा प्र.ह, सरस्तीरमायान्तु सा मया स्त्रियः ।१२।