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कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariHindipublished259 pages

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Page 57

३१० ] [ कल्कि पुराण
त्वया ध्यातं तु यद्रूपं विष्णोरमिततेजसः ।
तत्साक्षात्कृतमित्येव न तत्र कियदन्तरम् ।१३।
ब्रूहि तन्मम किं कुत्र जातः कीर परावरम् ।
जानासि तत्कृतं कर्म्म विस्तरेणात्रवर्णय ।१४।
वृक्षादागच्छ पूजां ते करोमि विधिबोधिताम् ।
बोजपूरफनाहार कुरु साधु पयः पिब ।१५।
किन्तु, समुद्र के उस पार एक परम आश्चर्यमय रूप वाला,
गुणी, अलौकिक एवं साक्षात् ईश्वर स्वरूप मनुष्य मुझे दिखाई दिया
है ।११। उसका सर्व सौन्दर्यमय देह ब्रह्मा द्वारा रचित प्रतीत नही होता ।
ध्यान-योग से देखे तो उसमे और भगवान् वासुदेव मे कुछ भी अन्तर
नही मिलेगा ।१२। हे पद्मे ! तुम भगवान् विष्णु के जिस अमित तेजोमय
स्वरूप का ध्यान करती हो, उस रूप मे और उस मनुष्य के रूप मे कोई
अन्तर दिखाई नही देता ।१३। पद्मा ने कहा—हे शुक ! तुमने अभी
क्या कहा है ? उस बात को पुनः कहो । उन्होने अवतार लिया है ? यदि
तुम उनका पूर्ण वृतान्त जानते हो तो मुझे विस्तार पूर्वक सुनाओ ।१४।
तुम वृक्ष से उतर आओ, मैं विधिवत् तुम्हारा सत्कार करूंगी । तुम
बीजपूर फलो का भक्षण और दुग्ध का पान करो ।१५।
तव चंचुयुगं पद्मरागादरुणामुज्ज्वलम् ।
रत्नसंघट्टितमहं करोमि मनसः प्रियम् ।१६।
कन्धरं सूर्यकान्तेन मणिना स्वर्णघट्टिना ।
करोम्याच्छादनं चारु-मुक्ताभिः पक्षतिं तव ।१७।
पतत्रं कुंकुमेनांगं सौरभैणातिचित्रितम् ।
करोमि नयनानन्ददायकं रूपमीदृशम् ।१८।
पुच्छमच्छमणिव्रात-घंघरेणातिशब्दितम् ।
पादयोनूपुरालाप-लापिनं त्वा करोम्यहम् ।१९।
तवामृतकथाव्रातत्यक्ताधि-शाधि मामिह ।