कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextसप्तम अध्याय-२ ] [ ३०५
षोडशश्लोकपुष्पैः । स्तुत्वा नत्वा पूजयित्वा विधिज्ञाः
शुद्धा मुक्ता ब्रह्मसौख्यं प्रयान्ति ।२८।
पद्मोदितमिदं पुण्यं शिवेन परिभाषितम् ।
धन्यं यशस्यमायुष्यं स्वर्ग्यं स्वस्त्यन दरम् ।२६।
पठन्ति ये महाभागास्ते मुच्यन्तेऽहसोऽखिलात्
धर्म्मार्थकाममोक्षाणां परत्रेह फलप्रदम् ।३०।
इस विधि को जानकर जो मनुष्य भक्ति भाव से भगवान् विष्णु
के इस रूप का ध्यान करके षोडश श्लोक रूपी पुष्पो से स्तुति और
नमन करके पूजा करते हैं, वह शुद्ध और मुक्त होकर ब्रह्मानन्द को प्राप्त
होते हैं ।२८। शिवोक्त यह स्तोत्र, जिसे पद्मा ने कहा है, अत्यन्त पुण्य-
मय है तथा धन, यश, आयुष्य, स्वर्ग एवं मगल का देने वाला है ।२६।
यह स्तोत्र इहलोक और परलोक मे धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष रूप चारों
पदार्थों का दाता है । इसका पाठ करने वाले महाभाग पुरुष सभी पापो
से मुक्त हो जाते हैं ।
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