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कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariHindipublished259 pages

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( २५८ )
प्राचीन काल मे वैदिक तान्त्रिक आदि विविध शास्त्रो के द्वारा
आराधित इन्द्र सहित देवता, मुनीश्वर और लोकपालो द्वारा स्वकार्य-
सिद्धि के लिए भक्तिपूर्वक सतत उपासित, विघ्नेश, अनन्य, अच्युत,
अजन्मा, सर्वज्ञ एव सर्वाश्रय स्वरूप भगवान् विष्णु का वन्दन करता
हूँ ॥१॥ नर, नारायण कहे जाने वाले नरोत्तम को एव भगवती सरस्वती
को नमस्कार करके उनकी जय बोलता हूँ ॥२॥
जिनके भयकर भुज भुजग के विष ज्वाल मे पडकर अपने घोर
अत्याचारो से भूमडल की शान्ति भग करने वाले राजागण भस्म हो
जायगे और जिनके भयकर खड्ग की तीक्ष्ण धार से राजाओ के देह
मर्दित होगे, वे ब्राह्मण वश मे उत्पन्न होकर, युग-युग मे अवतार धारण
करने वाले भगवान् श्री हरि कल्क रूप मे रक्षा करे ॥३॥
सूतजी के यह वचन सुन कर नैमिषारण्य निवासी शौनकादि महा-
भागो मे उनसे पूछा ॥४॥ हे सूतजी ! हे सर्व धर्मो के ज्ञाता, हे लोम-
हर्षरण-पुत्र ? हे त्रिकालज्ञ ? हे पुराणो के भली प्रकार जानने वाले ?
अब आप भगवान् की कथा को विस्तृत रूप से कहिये ॥५॥ कलि कौन
है ? वह कहाँ उत्पन्न हुआ ? वह किस प्रकार पृथिवी का अधीश्वर
बन गया ? तथा उसने नित्यधर्म को किस प्रकार विनष्ट कर दिया ?
यह सब हमारे प्रति कहिये ॥६॥ महर्षियो के यह वचन सुनकर सूतजी
ने भगवान् श्री हरि का ध्यान किया और फिर पुलकित अग होकर
कहने लगे ॥७॥
शृणुध्वमिदमाख्यानं भविष्य परमाद्भुतम् ।
कथि ब्रह्मणा पूर्वं नारदाय विपृच्छते ॥ ८ ॥
नारद प्राह मुनये व्यासायामिततेजसे ।
सव्यासो निजपुत्राय ब्रह्मराताय धीमते ॥ ६ ॥
स चाभिमन्युपुत्राय विष्णुराताय ससदि ।