कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in context३०० ] [ कल्कि पुराण
स्वयंवरगता मा ते विलोक्य रुचिरप्रभाम् ।
रत्नमालाश्रितकरा निपेतु काममोहिता ।३७।
तत उत्थाय सभ्रान्ता सप्रेक्ष्य स्त्रीत्वमात्मन ।
स्तनभार नतम्बेन गुरुणा परिणामिता ।३८।
ह्रिया भिया च शत्रूणा मित्राणामतिदु खदम् ।
स्त्रीभाव मनसा ध्यात्वा मामेवानगता शुक !
पारिचर्य्या हररता सख्य स्वगुणान्विता ।
मया सम तपोध्यान पूजा, कुर्व्वन्ति सम्मता ॥४०॥
तदुदितमिति सनिशम्य कीर श्रवणमुख निजमानसप्रकाशम्।
समुचितवचनैःप्रतोष्य पद्मा मुरहरयजन पुन प्रचष्टे ॥४१॥
यह सभी युवावस्था वाले, रूप, गुण एव ऐश्वर्य से सम्पन्न थे ।
यह सभी मेरे साथ विवाह करने की इच्छा से आकर स्वयवर-स्थल मे
सुखपूर्वक बैठ गये ।३६। मुझ सुन्दर प्रभा वाली को हाथ मे रत्नमाला
लेकर स्वयवर-स्थल मे घूमती देखकर यह सभी काम मोहित राजागण
पृथिवी पर गिर गये ।३७। फिर जब सचेत होकर उठे तो अपने को
स्त्रीत्व के सभी लक्षणो से युक्त अर्थात् स्त्री रूप मे पाया ।३८। तब तो
यह अपने को स्त्री हुआ जान कर बडे दुःखी हुए और शत्रु मित्र आदि की
लज्जा छोड कर मेरे ही साथ चल पडे ।३६। अब यह सर्वगुण सम्पन्न
नारी रूपी राजागण मेरी सखी होकर मेरे साथ ही भगवान् विष्णुका तप,
ध्यान एव पूजन करते है ।४०। अपनी इच्छा के अनुकूल, सुनने मे सुख-
दायक इस वार्ता को सुन कर शुक ने समुचित वाणी से पद्मा को प्रसन्न
किया और फिर भगवान् विष्णु के पूजन के प्रसङ्ग मे प्रश्न किया ।४१।