कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in context२६८ ] [ कल्कि पुराण
मे सन्तप्त तथा भोग सुख से परे एवं मनस्विनो के दर्शनार्थ ही यहाँ आ
पहुँचा हूँ ।२२। तुमने हास्यालाप, सखियोका सग और आभरणको त्याग
रखा है । तुमको उस स्थिति मे देखकर दीन-हृदय हुआ मै तुम्हारी
कोकिल जैसी मधुर वाणी मे तुम्हारे सन्तप्त रहने कारण जानना चाहता
हूँ । २३। तुम्हारे, ओष्ठ और जिह्वा के अग्र भाग मे निसृत अक्षर
पक्तियाँ जिसके कानो को सुनाई पड जाय, उसकी तपस्या का प्रभाव
कहाँ तक कहा जा सकता है ? ।२४। तुम्हारे समक्ष शिरस के पुष्पो की
कमनीयता भी क्या है ? तथा चन्द्रकान्ति भी क्या वस्तु है ? ज्ञानीजन
जिस ब्रह्म रूपी पीयूष का वर्णन करते है, वह आनन्द भी तुम्हारी
क्या समता करेगा ? ।२५।
तिलकालकसमिश्र लोलकुण्डलमण्डितम् ।२६।
लोलेक्षणोल्लसद्वक्नेत्र पश्यताम् न पुनर्भव. ।२७।
बृहद्रथसुते ! स्वाधि वद भामिनि यत्कृते ।
तप क्षीणामिव तनू लक्षयामि रुज विना ।
कनकप्रतिमा यद्वत मासुभिर्मलिनीकृता ।२८।
कि रूपेण कुलेनापि धनेनाभिजनेन वा ।
सर्व निष्फलतामेति यस्यदैवमदक्षिणम् ।।२६।।
शृणु कीर समाख्यान यदि वा विदित तव ।
बाल्य-पौगण्ड-केंशोरे हरसेवा करोम्यहम् ।३०।।
तुम्हारे तिलक, अलक से युक्त चचल कुण्डलो से मण्डित तथा
चंचल नेत्रो से सुशोभित सुन्दर मुख का दर्शन करने वाले को
पुनर्जन्म धारण नही करना होता । २६ २७। हे बृहद्रथसुते ! अपने मान-
सिक दुख का कारण मुझे बताओ । हे भामिनि ! तुम्हारी देह बिना
रोग के ही, तप से क्षीण दिखाई दे रही है । जैसे मैल के कारण कचन
की प्रतिमा मैली हो जाती है, वैसे ही तुम्हारा देह भी मलीन होगया
है ।२८। पद्मा ने कहा—धन अथवा उच्च कुल मे उत्पन्न होने से ही