कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextषष्ठ अध्याय
तत. सा विस्मितमुखी पद्मा निजजनैर्वृता।
हरिं पतिं चिन्तयन्तो प्रोवाच विमला स्थिताम् ॥१॥
विमले किं कृतं धात्रां ललाटे लिखनं मम ।
दर्शनादपि लोकानां पुंसां स्त्रीभावकारकम् ॥२॥
ममापि मन्दभाग्याया पापित्या. शिवमेवनम् ।
विफलत्वं मनुप्राप्त बीजमुप्त यथोपरे ॥३॥
हरिर्लक्ष्मीपति सर्वजगतामधिप प्रभु ।
मत्कृतेऽप्यभिलाष किं करिष्यति जगत्पति, ॥४॥
यदि शम्भोर्वचो मिथ्या यदि विष्णुर्न मां स्मरेत् ।
तदाहमनले देहं त्यक्ष्यामि करिभाविता ॥५॥
शुकदेव जी बोले—तदनन्तर विस्मित मुख वाली पद्मा अपनी
सहेलियो के मध्य स्थित हुई, भगवान् विष्णु को पतिरूप मे विचार करती
हुई, अपने निकट स्थित विमला नाम की सहेली से कहने लगी ।१।
पद्मा बोली — हे विमले ! क्या ब्रह्मा ने मेरे भाग्य मे यही लिख दिया
है कि जो पुरुष मुझे देखे, वह तुरन्त स्त्रीत्व को प्राप्त हो जाय ।२। हे
सखी ! जैसे मरुभूमि मे बोया गया बीज निष्फल होता है, वैसे ही मुझ
अभागिनी एव पापिनी द्वारा भगवान् शकर की, की गई उपासना व्यर्थ
होगई ।३। भगवान् रमापति विष्णु सम्पूर्ण विश्व के अधीश्वर और प्रभु
हैं मैं उन्हे पति रूप मे प्राप्त करने की कामना करूँ तो क्या वे मुझे स्वी-
कार करेगे ? ।४। यदि भगवान् शम्भु का वचन मिथ्या हो गया और
भगवान विष्णु ने मेरी कामना नही की तो मैं उन्ही भगवान् श्री हरि
का ध्यान करती हुई अपने देह को अग्नि कुण्ड मे डाल कर भस्म कर
दूँगी ।५।
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