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कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariHindipublished259 pages

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२६२ ] [ कल्कि पुराण
किङ्किणी से लोको को मोहने वाली झंकार करती हुई और आगत नरेशो
के कुल, गुण, शील आदि का वर्णन श्रवण करती हुई वह हंसगति वाली
राजकन्या हाथ मे रत्नमाला लिए हुए अपने चंचल अंगो से शोभा को
पाती हुई और कटाक्षपूर्वक सब को देखती हुई बढ़ती जा रही थी । वह
हिलते हुए कुण्डल वाली, केशकुन्तल की चंचलता से युक्त, सुन्दर ग्रीवा
वाली, विकसित मुख से मद मुमकराती हुई, जिसके दांतो की पक्तियाँ
चमक रही थी, लाल रंग के रेशमी वस्त्र धारण किये हुए, कोकिला
जैसे कण्ठ स्वर वाली, जिसके रूप लावण्य से तीनो लोक मोहित हो रहे
थे, उस मनमोहिनी सुकुमारी राज कन्या को रंगभूमि मे घूमती हुई देख-
कर कामदेव के वशीभूत हुए राजागण ऐसे विह्वल चित्त होगये कि
उनके शस्त्रास्त्र और वस्त्रादि सभी खुल-खुल कर पृथिवी पर गिरने
लगे ।१६-२४।
तस्याः स्मरक्षोभ निरीक्षणेन स्त्रियो बभूवुः कमनीयरूपाः ।
बृहन्नितम्बस्तनभारनम्रा सुमध्यमास्तत्स्मृतिजातरूपा. ।२५।
विलासहास व्यसनातिचित्राः कान्तानन. शोणसरोज नेत्राः ।
स्त्रीरूपमात्मानमवेक्ष्य भूपास्तामन्वगच्छन्विशदानुवृत्त्या ।२६।
अह वटस्थः परहर्षितात्मा पद्माविवाहोत्सवदर्शनाकुल. ।
तस्या वचोऽन्तर्हृदि दुःखितायाः श्रोतु स्थित. स्त्रीत्वमितेषु तेषु ।
जाहीहि कल्के कमलाविलाप श्रुत विचित्रं जगतामधीश ।
गते विवाहोत्सवमङ्गले सा शिव शरण्य हृदये निधाय ।२८।
तान्दृष्ट्वा नृपती.गजाश्वरथिभिरत्यक्तान्सखित्व गतान् ।
स्त्रीभावेन समन्विताननुगतानपद्मा विलोक्यान्तिके ।
दीना त्यक्तविभूषणा विलिखती पादागुलै. कामिनी ॥
ईशं कर्तुं निजनाथमीश्वरवचस्तथ्य हरिसाऽस्मरत् ।२६।
काम से विमोहित हुए उन राजाओ ने जैसेही उस राजकन्या को
वासनामय नेत्रो से देखा वैसे ही वे जिस रूप पर लालायित हुए थे, वैसे